Monday, April 15, 2013

स्याल्दे बिखौती (बैसाखी) कौतिक (मेला) और बिखौती त्यार


स्याल्दे बिखौतीबैसाखी पर्व को हमारे देश के सभी प्रान्तों में अलग अलग नामों से जाना जाता है जैसे, बिखौती, बीहू, बैसाखी,। हर साल ये पर्व मुख्य रूप से गेहूं की फसल पकने के स्वागत में आयोजित किया जाता है।

ऐसे ही देश के एक सुंदर से प्रान्त यानि देवभूमि उत्तरांचल में इस पर्व को बिखौती के नाम से जाना जाता हैआज के दिन घर पर पकवान भी बनाए जाते हैं। जैसे पूरी, खीर, साई (चाँवल का हलवा) इत्यादि।

विषुवत इसलिये कहा जाने वाला ठहरा क्यूंकि आज के दिन हमारे पहाड़ के गाँव घरों में अलग अलग मान्यताओं प्रथाऔं के हिसाब से रोग आदि से बच्चों को दूर रखने के लिये प्राचीन समय से चली आ रही कुछ प्रथाएँ मानी जाती हैं।
कहीं कहीं आज के दिन जौं की बाली नाभि में लगा कर विष झाड़ा जाता है तो कुछ जगहों पर बिखौती के इस त्यार (पर्व) पर 'ताव' हाल ने का रिवाज है इस रिवाज में लोहे के पतले से डंडे को आग में गरम किया जाता है और जब वो लाल हो जाता है तो उस से शरीर में पाँच या सात बार हल्के से टच किया जाता है। कहा जाता है कि ऐसा करने से शरीर में होने वाले रोग नष्ट हो जाते हैं, बीमारियों का खतरा नहीं रहता है। गाँव में बुजुर्ग लोग अक्सर बच्चों को बीमारियों से दूर रखने के लिये किया करते थे...कुछ जगहों पर अब भी शायद हो सकता है किया जाता हो। यह भी हो सकता है कि अलग अलग स्थानो पर इसे कुछ अलग नाम से जाना जाता हो।  ये सारी चींजें अब समाप्त होने को हैं मुश्किल से ही कहीं भी देखने को मिलती हैं। 

इस दिन उत्तरांचल के कुमाऊ मण्डल में कई स्थानों पर मेला लगता है उनमें से ही एक प्रमुख मेला है अल्मोड़ा के द्वारहाट में स्याल्दे बिखोती का भव्य मेला जो बहुत ही चर्चित है। कहीं कहीं तो बिखौती के इस पावन पर्व पर संगमों पर नहाने का भी रिवाज है आज के दिन लोग बागेश्वरजागेश्वर, रामेश्वर संगमों पर स्नान करने भी जाते हैं 

इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है  ये कहा जाता है कि जो उत्तरायणी पर नहीं नहा सकतेकुम्भ स्नान के लिए नहीं जा सकते उनके लिए इस दिन स्नान करने से बहुत ही उपयोगी सिद्ध होता है। हर संगम पे भी इस दिन मेले का सुंदर नजारा रहता है।

स्याल्दे बिखौती का ये प्रसिद्ध मेला प्रतिवर्ष वैशाख माह के शुरू में आयोजित होता है । द्वाराहाट से आठ कि.मी. दूर प्रसिद्ध शिव मंदिर विभाण्डेश्वर में इस मेले का आयोजन होता है। इस मेले को भी 2 भागों में बांटा गया है। पहला चैत्र मास की अन्तिम तिथि को विभाण्डेश्वर मंदिर में तथा दूसरा वैशाख माह की पहली तिथि को द्वाराहाट बाजार में ।

हर साल चैत महीने के अंतिम दिन रात को विमांडेश्वर में बिखौती का मेला लगता है। सभी लोग रातभर झोड़ा गीत गाते हैं और सुबह अपने अपने घरों को लौट जाते हैं। बैसाख एक गते यानि संक्रांत को द्वाराहाट में 'बाट पूजै' का मेला लगता है इस मेले में नौज्यूला समूह से जुडे़ गांवों के लोग 'ओड़ा' (दो जगहों के बँटवारे का नीसान पत्थर) भेंटते हैं। 2 पैट (गते) बैसाख को स्याल्दे का मुख्य मेला लगता है इस मेले में 'आल व गरख' समूह के गांवों के लोग अपने ढ़ोल-नगाडे़ और निशान के साथ मेला स्थल तक पहुंचते हैं और ओड़े को भेंटते हैं।

द्वारहाट के इस स्याल्दे कौतिक (मेले) में नेपाल भूटान आदि जगहों से भी भारी मात्रा में लोग आते हैंस्याल्दे का ये मेला ब्यापारिक दृष्टि से भी बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध है| झोड़े चाँचरी गा कर दूर दूर से आए हुए लोगों का मनोरंजन किया जाता है। सभी लोग अपनी अपनी कलाओं का भी यहाँ पर प्रदर्शन करते हैं। बहुत से नए कलाकार भी यहाँ अपनी कलकारी दिखते हैं या सुनाते हैं जिस से सभी लोगों का मनोरंजन हो जाता है|

बहुत समय पहले कुमाऊ के प्रसिद्ध गायककार श्री गोपाल बाबू गोस्वामी ने इस मेले की शोभा में अपने मधुर स्वरों से चार चाँद लगाया था। उनके द्वारा इस मेले पर दर्शाया हुआ एक गीत आज भी बहुत ही प्रसिद्ध है। इस गीत के बोल कुछ इस प्रकार से हैं...... “हे अलख्ते बिकौती मेरी दुर्गा हरै गे, हे दुर्गा चाने चान मेरी कमरे पटै गे।”

इस गीत में ये दर्शाया गया है कि द्वारहाट के स्याल्दे मेले में एक पति-पत्नी आये हुए हैं वहां पत्नी अपनी पुरानी सहेलियों के मिल जाने पर उनसे बातों में मशगूल हो जाती है और पति को लगता है कि वह खो गयी है और उसी को ढूंढते हुए वो वहाँ लोगों से पहले तो ये कहता है...... “हे अल्खते बिखौती मेरी दुर्गा हरै गे
अले म्यार दगाड़ छि यो म्याव मेंअले जानी काँ शटिक गे। येल म्यार गाव गाव गाड़ी ह्यालोमी कॉ ढूढ़ँ इके इतु खूबसूरत छो योक्वे शटके ली जालो। क्वे गेवाड़िया या द्वार्हटिया तो म्यार ख्वार फोड़ हो जाल दाज्यू देखो धैं तुमिल कैं देखि ? फिर बहुत देर ना मिलने के बाद वो गीत गाने लगता है जो (देवनागरी लिपि में)कुछ इस तरह से है......


हे अलख्ते बिकौती मेरी दुर्गा हरै गेदुर्गा चाने चान मेरी कमरे पटै गे।
तुमुले देखि छो यारो बते दियो भागी….रंगीली पिछोड़ी वीकी बुटली घागेरी,
आंगेड़ी मखमली दाज्यू दुर्गा हरै गे
मेरी हंसीनी मुखड़ी मेरी दुर्गा हरै गे….सार कौतिक चाने मेरी कमरा पटे गे,
खित खित हँसुण वीकोतुर तुरी आँखी
बुलाणो रसीला दाज्यू बिणाई जे बाजी,
कल कली पाई नाचेछे दुर्गा हरै गे
मेरी रीतु की आंसूई मेरी दुर्गा हरै गे…..सार कौतिक चाने मेरी कमरा पटे गे
दुर्गा मी के खाली मै टोकलि
गुलाबी मुखड़ी वीकी काई काई आंखि
गालड़ी उगाई जैसी ग्यु की जै फुलुकी,
सुकिला चमकाना दांता मेरी दुर्गा हरै गे….हाय सार कौतिक चान मेरी कमरा पटे गे
अल्बेर बिखौती मेरी दुर्गा हरै गे
दुर्गा चाने चाने मेरी कमरा पटे गे
हे…………दाज्यू तलि बजारा मलि बजारा द्वाराहाटा कौतिक 
तलि बजारा मलि बजारा सार कौतिक में ढूंढ़ई
हाय दुर्गा तू काँ मर गई पाई गे छे आंखी,
हाय दुर्गा….तू काँ मर गे छे पाई गे छे आंखी।
मेरी दुर्गा हरै गे,
ये अल्खते बिखौती मेरी दुर्गा हरै गे।
अब मैं कसिक घर जानू दुर्गा का बिना,
कौतिक्यारा सब घर नैई  गयीधार नै गो दिना,
म्येर आंखी भरीण लेगे दाज्यू किले हसणो  तामी,
मेरी दुर्गा हरै गे
सार कौतिक चाने मेरी कमरा पटे गे
 हिरदा सार कौतिक चाने मेरी कमरा पटे गे,
हिरदा दुर्गा हरै गेहिरदा दुर्गा हरै गे ,
बतै दे दुर्गा हरै गेहिरदा दुर्गा हरै गेहिरदा दुर्गा हरै गे.

इस गाने का हिन्दी भावार्थ इस प्रकार है “अरे इस बिखौती मेले में मेरी दुर्गा(उसकी पत्नी का नाम) कहीं खो गयी है। पूरे मेले में उसे ढूंढते ढूंढते मेरी कमर में दर्द हो गया है। अरे किसी ने उसे देखा है तो बता दो दोस्तो, उसने रंगीला पिछौड़ा पहना था, बूटे वाली घाघरी पहनी थी और मखमल का अंगरखा था कितना हँसमुख तो चेहरा था उसका। ना जाने कहां चली गयी। कैसे तो खिलखिला कर हँसती थी, प्यारी से सुन्दर आँखें थी उसकी और आवाज तो जैसे मोहक बिणाई (एक पहाड़ी वाध्य यंत्र) की प्यारी सी धुन। उसका वो गुलाबी मुँह, काली काली आँखें और गेहूँ की फूली रोटी के जैसे फूले गाल, चमकते हुए सुहाने दांत। ना जाने कहां चली गयी। मैने उसे बजार में नीचे से ऊपर सब जगह ढूंढ लिया है, ना जाने कहाँ मर गयी, अब तो मेले वाले सारे लोग भी घर चले गये, सूरज भी छिपने लगा, ना जाने दुर्गा कहाँ चली गयी। उसे लिये बिना मैं अब घर कैसे जाऊँ, आँखों से मेरे आँसू निकल रहे हैं..ना जाने मेरी दुर्गा कहाँ खो गयी। हरदा तुम्हे मजाक सूझ रहा है बतादो ना यार मेरी दुर्गा कहाँ है। बता दो ना…हरदा! हरदा मेरी दुर्गा खो गयी है।

दोस्तो कैसा लगा ये पोस्ट आपको बताइयेगा जरूर। 

स्याल्दे बिखौती की विडियो देखने के लिए हमारी ठेठ पहाड़ी यूट्यूब विडियो चैनल को देखें उसमें आपको कौतिक की विडियो भी मिलंगी।

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हमारे पहाड़ गाँव की "विषुवत संकांत" या "बिखौती त्यार" की बधाई ठहरी आप सबको। 

धन्यवाद। 

Thursday, April 11, 2013

दिल्ली मेट्रो का रोज(डेलि) का सफर


दोस्तों सोच रहा था कि क्या लिखूँ आप लोगों के लिये तभी एकदम से ख्याल आया क्यूँ न आज अपने देल्ही मेट्रो (Delhi Metro) के रोज के सफर के बारे में लिखूँ।

रोज सुबह 8:40 पे रूम से निकल जाता हूँ ऑफिस जाने के लिये फिर रूम से 10-15 मिनट वॉक करने के बाद उत्तम नगर वेस्ट मेट्रो स्टेशन पे पहुँच कर वही 8:55 या 9:00 पे वैसाली की ओर जाने वाली ट्रेन पे चडता हूँ क्यूंकी ऑफिस लक्ष्मी नगर में है न इसलिए।

जैसा कि दोस्तों आप में से लगभग सभी लोग जानते हैं कि मेट्रो में बहुत सारी शीट आरक्षित होती हैं, बुजुर्गो, विकलांगों और महिलाओं के लिये। ये अच्छी बात है हम सब को इस का ख्याल रखना चाहिए सबसे पहले।

जब भी मैं मेट्रो पे होता हूँ रोज कुछ ऐसे लोगों को देखता हूं जो आरक्षित शीटों पे बैठ जाते हैं और बिल्कुल आँखें बंद करके सोने की नौटंकी टाइप करने लगते हैं इस से वो सोचते हैं कि कोई आएगा तो वो उसे सोता देख कर शीट के लिये बोलेगा नहीं, मै अपने विचार से कह रहा हूं शायद वो यही सोचते होंगे। लेकिन ये अच्छी बात नहीं है, ये बहुत बुरी बात है कि हमे मालूम है कि वो शीट आरक्षित है फिर भी हम उस शीट का अपने लिये इस्तेमाल कर रहे हों।

वही आरक्षित शीट क्यूँ अगर हम किसी शीट पे बैठे हों और हमे कोई तकलीफ नहीं है तो उस समय अगर हमारे सामने कोई बुजुर्ग, या विकलांग खड़ा हो तो हमे वो शीट उसे दे देनी चाहिए, बिना बोले ही।

कई बार मैंने देखा है कि बहुत से ऐसे बुजुर्ग लोग होते हैं जो अपनी शीट छोड़ देते हैं अपने से ज्यादा बुजुर्ग व्यक्ति के लिये लेकिन बगल मे बैठा हुआ हटा-कटा व्यक्ति शीट नहीं छोड़ ता। ये कोई अच्छी बात है क्या नहीं ना दोस्तो ?

जहां तक मैं अपना जानता हूं अब तक तो मैं कभी भी आरक्षित शीट पे नहीं बैठा भले ही वो आरक्षित शीट खाली ही क्यूँ न हो, अब ऑफिस टाइमिंग पे तो भीड़ भी बहुत होती है तो शीट मिलना तो मुश्किल ही होता है फिर भी कभी भी अगर मेट्रो का सफर कर रहा होता हूं तो भी मैं कभी ऐसा नहीं करता। भले ही मैं पूरा सफर खड़े ही तय कर लूँ।

ये तो रही शीट की बातें एक बात और ध्यान में आई, अक्सर आप में से भी कई लोगों ने देखा होगा कि कई लोग ऐसे होते हैं जो बिल्कुल मेट्रो ट्रेन के गेट पर खड़े हो जाते हैं वो भी साइट में नहीं बल्कि बीच में, पता नहीं ये उन्हे क्या अच्छा लगता है। अरे कम से कम गेट तो खाली छोड़ देना चाहिए ना मानता हूं कि भीड़ काफी होती है जिस से अंदर जगह नहीं होती है...तो फिर भी ऐसे लोगों को कम से कम उतरने वाले को रास्ता तो देना ही चाहिए ना अगर वो गेट पे खड़ा है तो उसे बाहर हो जाना चाहिए थोड़ा उस समय जब लोगों को उतरना होता है। फिर तो वो चड़ ही सकता है ना, पर क्यूँ नहीं ऐसा सोचते हैं ये लोग।

मैं तो इस पोस्ट के माध्यम से यही कहना चाहता हूं कि ये चीजें थोड़ी समझ नी चाहिए हमें।

बाँकि दोस्तों कैसा लगा ये पोस्ट आपको ? आप लोग भी अपने कुछ विचार व्यक्त करे इसके बारे में, कमेंट्स के द्वारा।

ध्न्यवाद अपना बहुमूल्य समय देने के लिये।

Saturday, April 6, 2013

आस्था का एक केन्द्र महाकाली गंगोलीहाट मंदिर

Haat-Kalika-Gangolihat
जैसा कि दोस्तो हम सभी जानते हैं नवरात्रों में देवी पूजा का विशेष महत्व है, और इस अवसर पर 'हाट कालिका' का जिक्र कहीं न आए ऐसा कम से कम कुमाऊं क्षेत्र में तो बिलकुल संभव नहीं है। आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित महाकाली शक्तिपीठ में मत्था टेकने के लिए पूरे नवरात्रों में देश के कोने कोने से भक्तजन यहाँ पहुंचते हैं। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित स्कंद पुराण के मानसखंड में इस आदि शक्ति पीठ का विस्तार से वर्णन है। 

उत्तरांचल के पिथौरागढ़ जिले में मन को अति लुभाने वाली एक नगरी गंगोलीहाट है। मुख्य बाजार से लगभग 1 किलोमीटर दूरी पर देवदार के झुरमुट के मध्य प्राचीन 'माँ भगवती महाकाली' का अदभूत मंदिर है। इस मंदिर को चाहे पौराणिक दृष्ठी से देखेँ या धार्मिक दृष्टि से हर स्थिति में यह पूर्णतया सभी आने जाने वाले भक्तों का मनमोहने में सक्षम है।

 यहाँ आने वाले हर एक भक्त यही कहता है कि श्रद्धा से जो भी व्यक्ति माँ भगवती के चरणों में आराधना करता है उसके सभी प्रकार के रोग, विकार, दरिद्रता एवं कष्टों का अंत हो जाता है। यही कारण है जो पूरे साल भर दूर दूर से लाखों श्रधालु माँ के दरवार में आते हैं और वो ये भी बताते हैं कि कैसे माँ माहाकाली ने उनकी सारी मनोकामनए पूरी की।
विदेशी पर्यटकों का भी यहाँ भारी मात्रा में साल भर तांता लगा रहता है। माँ काली के दर्शन पाकर वो लोग बहुत ही धन्य बताते हैं अपने आपको। 

चमत्कारों से परीपूर्ण  इस माँ भगवती के दरवार में समय समय पर शतचंडी महायज्ञ, अष्टबलि अठवार, सहस्त्र चण्डी यज्ञ, आदि का पूजन समय-समय पर आयोजित होता रहता है। यही माँ का एक ऐसा दरवार है, जहां पूर्णिमा हो या अमावस्या प्रति दिन हवन यज्ञ होते हैं। जब कभी मंदिर में शतचंडी महायज्ञ का आयोजन होता है तब माँ के इस  दरबार की आभा और भी देखने लायक हो जाती है। उस समय प्रतिदिन १०८ ब्राह्मणों द्वारा शक्ति पाठ की गूंज से चारों ओर भक्ति की गुंजायमान से ऐसा प्रतीत होता है  मानों समस्त देवी देवता शैल पर्वत पर आकर रहने लगे हों। 

माँ के इस मंदिर में पूजा पाठ का कार्यक्रम अर्ग्रोन गांव के पंत लोग सम्पन्न कराते हैं, उनकी अनुपस्थित में यह दायित्व हाट गांव के पाण्डेय निभाते हैं।

रामगंगा एवं सरयू नदी के मध्य बसे गंगावली की सुंदर घाटी में स्थित भगवती के इस पावन  स्थल की बनावट त्रिभुजाकार बतायी जाती है, और यही त्रिभुज तंत्र शास्त्र के अनुसार माँ भगवती का साक्षात् यंत्र है।

यहां हर कोई धनहीन धन की इच्छा से, पुत्रहीन पुत्र की इच्छा से, सम्पत्तिहीन सम्पत्ति की इच्छा से सांसारिक मायाजाल से विरक्त लोग मुक्ति की इच्छा से प्रति दिन आते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ण पाते हैं। 

आजादी से पहले गंगावली के इस क्षेत्र में मोटर यातायात की कोई भी सुभीधा नहीं थी फिर भी पैदल यात्रा से यात्री यहां की नैसर्गिक सौंदर्य का आनन्द लेने आया करते थे।

माँ के इस दरवार मे जब कभी भी पूर्व में सहत्रघट का भव्य आयोजन किया जाता था तो रामगंगा एवं सरयू नदी से भक्तजन माँ के जयकारों के साथ गागरों में पानी भर के  लाते थे, और इसके साथ साथ प्राचीन जल श्रोतों (नौलों, धारों) से भी ताबें की गंगरियों में जल लाकर इस शक्तिपीठ में जलाभिषेक करते थे। उस समय  में गंगावली की इन सुंदर वादियों का नजारा दिव्य लोक सा मालूम पडता था।
इस 'सहत्रघट' का आयोजन तब किया जाता था, जब बहुत लम्बे समय से क्षेत्र में वर्षा नहीं होती थी। इस आयोजन के सम्पन्न होने के पश्चात सायंकाल के समय घनघोर मेद्य ललाट भरे बादल जो रौद्र रूप का प्रतिबिम्ब मालूम पड़ते थे, अपने साथ वर्षा की अनुपम छटा लाते थे। आधुनिकता के इस दौर में भी इस परम सत्य का नजारा सहत्रघट आयोजनों के अवसर पर यहां देखा जा सकता है। 

ये भी एक कहावत कही जाती है यहाँ, कि जब विश्व युद्ध  के समय भारतीय सैनिकों से खचाखच भरा एक जहाज समुद्र में डूबने लगा तो उसी जहाज में इस क्षेत्र के उपस्थित एक सैनिक ने माँ काली को याद कर डूबते जहाज को इस तरह से उबरवाया कि समुद्र की वादियों और पूरा जहाज जय 'श्री महाकाली गंगोलीहाट' वाली की जय-जयकार से गूंज उठा। तभी से भारतीय सैनिकों की इस मन्दिर के प्रति विशेष आस्था है। 

लगभग ३८,९३७ हैक्टेयर भौगोलिक क्षेत्रफल में फैलै इस गंगावली क्षेत्र में शिवालयों एवं देवी शक्तिपीठों की भरमार है, जिनमें चामुण्डा मंदिर, लमकेश्वर महादेव मंदिर, कोटेश्वर, गुप्तेस्वर, रामेश्वर मंदिर, विष्णु मंदिर, गोदीगाड मंदिर के अलावा पाताल भुवनेश्वर, भोलेश्वरहटकेश्वर, शैलेश्वर, मर्णकेश्वरचमडुगरा आदि प्रसिद्ध शिवालय हैं।

माता भगवती महाकालिका का यह पावन दरवार बहुत सारे अलौकिक दिव्य चमत्कारों से भरा पडा है। जिसका वर्णन करने में कोई भी समर्थ नहीं है।

इस माँ के दरवार के बारे में एक किवदन्ति ये भी है कि जब रात में माँ भगवती का  डोला चलता है तो इस डोले के साथ माँ के गण, आंण व बांण की सेना भी चलती हैं। कहते है यदि कोई व्यक्ति इस डोले को छू ले तो दिव्य वरदान का भागी बनता है। माँ का ये डोला हाट गांव के चौधिरयों द्वारा महाकालिका को चढायी गयी २२ नाली खेत में में चलने की बात कही जाती है। 

रात्री में महाआरती के बाद मंदिर में शक्ति पीठ के पास महाकाली माँ का विस्तर लगाया जाता है और प्रातः काल जब उस विस्तर को देखा जाता है तो ऐसा लगता है कि मानों यहां साक्षात् माँ कालिका विश्राम करके गयी हों क्योंकि विस्तर में सलवटें पडी रहती हैं।

जो यहाँ पशुबलि प्रथा है उसके बारे में कुछ बुर्जग लोग बताते हैं कि पशु बलि माँ को नहीं दी जाती है, क्योंकि जगतमाता अपने पुत्रों का कभी बलिदान नही लेती है। यह बलि माता के खास गण करतु को प्रदान की जाती है।

प्राचीन काल में स्थानीय क्षेत्र तामानौली के औघड बाबा भी कालिका माँ के भक्त रहे हैं।माँ काली के प्रति उनके तमाम किस्से आज भी इस क्षेत्र में सुने जाते है। 
 

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