Tuesday, July 16, 2013

हरेला (हरियाली का त्योहार)

हरेला (HARELA) उत्तराखंड का एक विशेष पर्व है जो खेती के साथ जुड़ा हुआ है। हरेले का यह त्योहार वैसे तो वर्ष में तीन बार आता है-
पहला चैत्र मास में - प्रथम दिन बोया जाता है तथा नवमी को काटा जाता है।

दूसरा श्रावण मास में - कहीं सावन लगने से नौ दिन पहले तो कहीं दस दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और  श्रावण के प्रथम दिन यानि संक्रांत को काटा जाता है।
और तीसरा आश्विन मास में - आश्विन मास में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है।

लेकिन सबसे अधिक महत्व श्रावण मास में पड़ने वाले हरेले को ही दिया जाता है! क्योंकि श्रावण या सावन का यह  महिना  भगवान शंकर (शिव जी) को अर्पित  है।  उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और यहाँ के पहाड़ों पर ही अधिकांश भगवान शंकर का वास माना जाता है। यहाँ अधिकतर स्थानों पर भगवान शंकर जी के मंदिर भी बने हुये हैं। जैसे लमकेस्वर, गुप्तेस्वर, मुक्तेस्वर, कोठेस्वर और भुवनेस्वर आदि नाम से !

यह भी एक कारण है श्रावण मास में पड़ने वाले इस हरेले का ज्यादा महत्व माना जाता है! सावन का महिना सुरू होने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोया जाता है। इसे बोने के लिए किसी थालीनुमा बर्तन या टोकरी का चयन किया जाता है। पहले तो लकड़ी की छोटी सी डलिया में इसे बोया जाता था अब लोग वैकल्पिक उपायों पर ज्यादा ध्यान देते हैं।

इसमें मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों का इस्तेमाल किया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को नहा धो कर पानी छिड़कते रहते हैं।
दसवें दिन विधिवत रूप से पूजा पाठ करके इसे काटा जाता है।

इसे घर में मंदिर के पास में रखा जाता है अंधरे कोने में जिस से इस पर सूर्य का प्रकाश बहुत कम पहुंचे।

मान्यता है कि हरेला जितना बड़ा और हरा भरा होगा उतनी ही आने वाली फसल बढ़िया होगी!

हरेला डाल ते समय बढ़े लोगों के द्वारा ये पारंपरिक आशीर्वाद भी दिया जाता है...:

जी रया ...
जागी रया ....
ये दिन ये बार भेटनै रया...
गंग कै बालू छन जाण क रया....
घ्वाड क सिंघउन जाण क रया....
दूब क जास झाड है जौ....
पाती जस फूल है जौ.....
हिमालय क ह्यूं छन जाण क रया ....
लाख दुति लाख हरेल है जन....
लाग हरयाव...लाग बग्वाव...
जी रे...जाग रे... बच रे..
दूब जौ पली जे..... फूल जौ खिल जे..
स्याव जस बुध्दि.....शेर जस तरान ह जौ..
सब बच रया......खुश रया...!
यै दिन यै मास भेंटन रैया....!

कैसे बोया जाता है हरेला: 
आपको तो पता ही होगा पर ये उन मित्रों के लिये जो पहाड़ की संस्कृति से प्यार तो करते हैं पर पहाड़(गाँव) से दूर रहते हैं। हरेला बोने के लिये क्या क्या किया जाता है पहाड़(गाँव) में वो इस प्रकार है.....
harela-uttarakhand-festival
  • किसी साफ स्थान से मिट्टी खोद कर लायी जाती है....विशेषकर काली मिट्टी, और इसे धो कर सूखाया जाता है.
  • किसी एक पुराने-नये कागज, लकड़ी, पलास्टिक का डिब्बा या कोई पुराना बर्तन या लकड़ी की बनी हुयी छोटी डलिया(छापर) में उस मिट्टी को रखा जाता है.
  •  पाँच या सात प्रकार के बीज जैसे गेहूं, जौं, मास, भट्ट, कल्यु, मक्का आदि को उस मिट्टी में बोया जाता है.
  • पूजा करके, टीका-चन्दन लगा कर, साफ पानी चड़ा कर उस बर्तन को मंदिर के पास रखा जाता है। 
  • और नित्य नहा धो कर उसमें जल छिड़का जाता है।
  • एवं सावन माह के संक्रांत के दिन इसे काटा जाता है जो एक त्योहार होता है।          

 "हरेला त्यार" हमारी लोक संस्कृति का परिचायक है। हरियाली को समर्पित यह त्योहार पूरे पहाड़(गाँव) को हरा भरा कर देता है। आई ना याद गाँव की अपने पहाड़ की !

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