Wednesday, February 26, 2014

तरुड़ या तेड़ (एक पहाड़ी कंद मूल आहार)

'तरुड़ या तेड़' हमारे पहाड़ यानि उत्तरखंड में महाशिवरात्री के व्रत में इस आहार का उपयोग करते हैं। यह वैसे तो एक सब्जी है लेकिन आलू की तरह इसे भी फल की श्रेणी में रखा गया है।  यह फल शिवरात्रि के दिन शिवजी को भोग में लगाया जाता है। यह प्राय दिखने में थोड़ा सा शकरकंदी के समान होता है पर ये मीठा नहीं होता है।
तरुड़-tarud
इसके स्वाद को हमारे पहाड़ में 'फराव' कर के संबोधित किया जाता है। इसे आलू की ही समान श्रेणी में रखा जाता है। ये जमीन के अंदर होता है इसकी बेल होती है जिस पर इसके बीज लगते हैं।

गाँव में महाशिवरात्री के पहले दिन तरुड़ को  खोदा जाता है। कहा जाता है कि जब ये लगाया (रोपा) जाता है उसके तीसरे साल या उसके बाद इसे खोदते हैं। इसे खोदते समय यह भी कहा जाता है कि जब यह खोदते समय दिखने लगता है तो देख कर उत्साहित नहीं होना चाहिए वरना इस पर नजर लग जाती है और ये जमीन के अंदर धँसने लगता है और गायब हो जाता है।

गाँव में तो लगभग हर किसी को ये नसीब हो जाता है पर बाजार वाले इलाकों में लोग इसे बाजार से ही खरीदते हैं। फिर इसे उबालने के लिये रखा जाता है और साथ ही आलू भी इसके साथ उबालने के लिये रखे जाते हैं।
दिन में व्रत के दौरान इसे उबले आलू की तरह भी खाते हैं क्यूंकी इसे एक फल कहा जाता है, और शाम को एक टुकड़ा भगवान के भोग के लिये रख कर बाँकी की सब्जी बनाई जाती है...थोड़ी सूखी सब्जी और थोड़ी दही या छांस डाल के तरी वाली सब्जी ! 

महाशिवरात्री के दिन दोपहर के बाद घर का एक व्रत वाला सदस्य लाल मिट्टी से शिवजी और पार्वती जी की प्रतिमूर्ति बनाता है जिनकी शाम को मंदिर के पास रख कर पूजा पाठ करते हैं। गाँव में पूजा के समय शिवजी को बेल पत्री, पाती और तरुड़ का भोग लगाया जाता है।

 "फराव" क्या होता है ? (सहाभार: उमेश चन्द्र पंत)
कुमाऊँनी फराव शब्द हिंदी के फलाहार का अपभ्रंश है कुमाऊँ बोली की अपनी कोई लिपि नहीं है और अधिकतर शब्द दूसरी भाषाओं से बने हैं, इसी क्रम में फलाहार भी कालांतर में फ़राव कहव जाने लगा, पहाड़ी संस्कृति के अनुसार व्रत में दो प्रकार का आहार लिया जाता है फलाहार और निराहार अर्थात फ़राव और निराव, फ़राव में अन्न का उपयोग नहीं किया जाता सिर्फ़ फल खाया जाता है.
तरूड़ एक जंगली कंदमूल फल है जो वल्लरी लता पर फल और भूमिगत तने दोनों के रूप में लगता है, को महाशिवरात्रि के दिन उबाल कर खाया जाता है,
जबकि निराव में फल और अन्न दोनों का प्रयोग नहीं होता, या तो ख़ाली पेट या फिर दूध का सेवन किया जाता है।


वैसे पहाड़ी संस्कृति के अनुसार व्रत और भी कई प्रकार के होते हैं जैसे लूँणि अर्थात नमक वाला और अलूँणि अर्थात बिना नमक वाला।
कुमाऊँनी संस्कृति में एक व्रत ऐसा भी है जिसमें हल से उगा हुआ अनाज नहीं खाया जाता बल्कि कूदाल (कुटव या कुटल) से बोया हुआ अनाज खाया जाता है उसमें भी विशेष रूप से उगल (हिंदी नाम-कट्टू) के आटे से बना पकवान खाया जाता है। (सहाभार: उमेश चन्द्र पंत)


दोस्तों ये मैंने अपने गाँव में अपने घर में देखा है इसिलिये आप के सामने प्रस्तुत किया है....तरीका थोड़ा अलग हो सकता है हर जगह पर ज्यादा अलग नहीं। शायद ऐसा ही आपके गाँव, घर में भी होता होगा। कुछ तो आपकी यादें भी जुड़ी होंगी इस से।

इसी के साथ आप सभी को मेरी ओर से  महाशिवरात्री की ढेर सारी शुभकामनायें जय भोले नाथ। जय भोले भण्डारी।

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Friday, February 21, 2014

समूह ग भर्ती परीक्षा के लिए उम्र सीमा बढ़ा कर 42 की गयी।

उत्तराखंड सरकार ने बेरोजगारों को राहत देने के लिये राज्य की सरकारी नौकरी के लिये उम्र सीमा 2 बड़ाकर 42 वर्ष करने का अहम फैसला लिया है और साथ ही समूह -ग की भर्तियों के विस्तार के लिये उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के गठन को भी स्वीकृति दे दी है। इस से राज्य मेन लगभग 10 हजार खाली पड़े पदों पर तेजी से भर्ती प्रक्रिया सुरू हो सकेगी।

बुधवार को देर रात तक हुयी कैबिनेट की बैठक में ये अहम फैसला लिया गया। जो राज्य के उम्र दराज बेरोजगारों के लिये एक राहत है। कैबिनेट में समूह 'ग' के रिक्त पदों पर सीधी भर्ती को उत्तराखंड अधीनस्थ चयन आयोग के गठन और इसके लिये विधेयक के मसौदे को मंजूरी मिली।   

Wednesday, February 19, 2014

पहाड़ों में भीषण बर्फबारी

पिछले महीने हुई बर्फबारी से थोड़ी सी राहत हुई थी कि फिर से पिछले 2-3 दिनों में पहाड़ के पर्वतीय इलाकों में दोबारा हिमपात हो गया है। 

Tuesday, February 18, 2014

बुरांस का फूल (कफ़ुवा)

uttarakhand burans flowerबुरांस का फूल अपनी सुंदरता के साथ साथ बहुत ही गुणकारी औषधी के लिये भी प्रसिद्ध है। यह उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में देखने को मिलता है।

प्राय ये फाल्गुन-चैत यानि कि फरवरी-मार्च में खिलना प्रारम्भ होता है। लेकिन अब ये ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समय से पहले ही खिलता हुआ दिखने लगता है।

 इसका पेड़ उत्तराखंड के राज्य बृक्ष  की श्रेणी में रखा गया है। बसंत के आगमन से ही इसके खिलने पर यहाँ की हंसी वादियां और भी मनोहारी लगने लगती हैं। एक हर जगह अलग ही तरह का सुंदर मन को लुभाने वाला वातावरण बन जाता है।
बुरांस का फूल
 "कफ़ुवा खिल्ण बैगे ऊंचा-नीचा 'धुर डाना' का डान्यू मा"।
बुरांस का यह फूल बहुत सुंदर होता है। इस फूल का उपयोग कई प्रकार के कोस्मैटीक चीजों में भी किया जाता है।
बुरांस के फूल का ज़्यादातर उपयोग इसके जूस बनाने में किया जाता है जो बहुत ही स्वादिस्ट और उपयोगी होता है।

बुरांस का जूस गर्मियों में काफी राहत प्रदान करता है। लोग बुरांस के इन फूलों को इकट्ठा कर के जूस बनवाते हैं। 

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