Monday, August 14, 2017

आहा रे उ दिन...आब कभते नि उन

"लाल मजेठी और जन्माष्टमी व्रत"

होय महाराज ऊई नानछ्नानु दिनानों बात करन लागि रयूं आज। दिन ले छ बार ले छ और मौक ले छ। आजकल त सबे त्यार ब्यार (त्योहार, पर्व) मनखी हिसाब ले द्वि द्वि हून भै गईं किलै की विचार अलग अलग है गईं। खैर क्वे बात नि भई हम तो जास छ्याँ उसै रुन हो महाराज।

(अब हिन्दी कुमाऊँनी मिश्रिती लिख रहा हूँ....क्यूंकि बहुत से मित्रों को शायद समझने में आशनी हो)
बल आज और भोल(कल) श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व है, लेकिन वो रौनक वो माहौल नहीं ठहरा हो बिल्कुल भी जो होने वाला ठहरा गाँव घरों में। फ़ैन्सी ड्रेस का टैम ठैरा आजकल भगवान ज्यू ले फ़ैन्सी है गईं बल, चस्म हस्म(चस्मा) पहनने लग गए ठहरे, टीवी सिरयलों के माफिक होने लग गया ठहरा अब । खैर छोड़ो.....मैं कुछ और भूली बिसरी यादों को सँजोके लाया हूँ।

हमारे पहाड़ के गाँव में वैसे तो सभी जानते हैं मेल मिलाप और बड़ी ही सुंदरता के साथ हर पर्व, त्योहार, आयोजन सुख-दुख में शामिल हुआ जाता है। अच्छे से याद ठहरा महाराज जब हम नानतीन(छोटे बच्चे) थे तो श्री कृष्ण जन्माष्टमी को भी बड़े ही धूम धाम से मनाने वाले हुये। इस दिन गाँव में किसी एक घर पर या 7-8 घरों के मोहल्ले के एक घर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा होने वाली ठहरी। सभी व्रत वाले काका काखी, आमा बूबू, दद्दा दीदी, भुला भुली वहीं पर एकत्रित होते थे भजन कीर्तन, झोड़ा-चाँचरी आदि होने वाले ठहरे।

बामण ज्यू का टैम ठहरा रात 11-12 बजे आना और फिर पूजा-पाठ होने वाली ठहरी और व्रत टूटने वाला हुआ।
खास तौर पर इस दिन हमारी बहनें और सभी व्रत वाली महिलाएं "लाल मजेठी" की पत्तियों की मेहंदी लगाने वाली ठहरी अच्छा शगुन माना जाने वाला हुआ इस दिन मजेठी(पहाड़ी मेहँदी) की मेहंदी लगाना। यह हाथों में गाड़ी लगे करके इसमें दाड़िम के रस को डाला जाने वाला हुआ या कुछ और माल्टा-नीबू के दानों का खट्टा। मुझे अच्छे से याद है महाराज हम लोग भी अपनी दीदी लोगों के साथ मजेठी पीस कर खूब लगाने वाले ठहरे..... पर शायद आजकल के पहाड़ी बच्चे मजेठी के बारे में जानते हों। बता देना चाहता हूँ पहले हमारे गाँव घरों में इसी मजेठी की मेहँदी लगाई जाती थी बाजार वाली कोई नहीं जानता था।

जन्माष्टमी के व्रत के दिन खास तौर से "दाड़िम के पत्तों" का पत्र भगवान को चड़ाया जाता था। व्रत के दिन उखाड़ फोड़ खाने वाले हुये, दाड़िम खाने वाले हुये, किसी के क्याल(केले) पके हों तो दूध क्याल खाने वाले ठहरे क्यूंकि इन्हीं दिनों ये फल भी तैयार हुये रहने वाले हुये। आजकल तो अब व्रत वाले चिप्स भी हैं बल, और भी क्याप क्याप। सोचने को मजबूर हो जाता हूँ आहा कतुक भाल(अच्छे) दिन ठहरे वो। आप लोग खुद ही सोच लो महाराज कितने आगे निकल गये हैं ना हम.....वो सब छोड़ कर।

"अन्यार कतुकै हौवो...उज़्यावैकि आस तो हुनेर भै" ~ श्री ज्ञान पंत

{आप सभी को श्री कृष्णजनमाष्टमी की भौत भौत शुभकामनायें ठहरी, जय श्री कृष्णा}
पोस्ट by Gopu Bisht (ठेठ पहाड़ी) ये भी कुछ जरिया हैं मेरे पहाड़ गाँव को महसूस करने के आप देख सकते हैं।

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Thursday, July 27, 2017

पहाड़ बेचकर मैदान में बसे हो और बात करते हो पर्यावरण और पहाड़ की

बहुत से मित्रों और स्नेहिजनों को जरूर ये बात कड़वी लगंगी पर यही सत्य हैं...
मैदानों में बसे पहाड़ प्रेमियों और पर्यावरण प्रेमियों पुरखों की धरोहर एवं सारा पहाड़ बेचकर मैदान में बैठे हो और बात करते हो पर्यावरण और पहाड़ की। अधिकांश पलायन तो पहाड़ों से इन पर्यावर्णविदों व पशु प्रेमियों के कारण ही हुआ ठहरा....अरे तुम्हें क्या पता आए दिन बाघ, भालू इन ग्रामीणों और उसके पालतू जानवरों को अपना ग्रास बना रहे हैं, बंद पैकेट का खाने वालों तुम क्या जानो आए दिन बंदर, जंगली सुंवर ग्रामीणों की मेहनत की फसल रौंद जाते हैं क्या किसी पर्यावरण विद या पशुप्रेमी ने इसके बारे में तनिक सोचा....अरे महाराज सभी सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुये वातानुकूलित कमरों में बैठ कर कागज कलम की सहायता से न ही पर्यावरण बचता है ना ही पशुधन।
अल्मोड़ा के एक गाँव में गाँव वालों द्वारा नदी में डाले कांटे में एक मछ्ली क्या फंस गयी सभी अपना पर्यावरण और पशु प्रेम दिखाने लगे....मत्स्य आखेट करते समय गौछ मछली उनके जाल में फंस जाएगी ये उन ग्रामीणों ने खुद नहीं सोचा होगा, जानबूझकर उसका शिकार नहीं किया गया होगा, और न ही गाँव वालों को इसके संरक्षित प्रजाति होने का पता होगा।
गौछ मछली
गौछ मछली पकड़ कर लाते ग्रामीण
बताते चलें कि नेपाल और उत्तराखंड के बीच बहने वाली पर्वतीय नदियों में ही अक्सर इस गौछ मछली का बसेरा माना जाता है। जहां तक जानकारी है मत्स्य आखेट प्रतिबंधित नहीं है शायद, हाँ ये बात अलग है कि संरक्षित वन क्षेत्र में बीना अनुमति के शिकार करना या किसी चीज का दोहन करना अपराध है। कोई भी नदी जंगल अगर ग्राम सभा के राजस्व क्षेत्र में है तो उसके जल से लेकर हर पैदावार पर ग्रामीणों का ही अधिकार होता है अगर वो प्रतिबंधित न हो तो।
ये तो सभी जानते हैं कि ग्रामीण दोहन करते हैं तो संरक्षण और पालन पोषण भी करते हैं पर वहीं दूसरी ओर मैदान में बैठे लोग सिवाय दोहन के कुछ करते नहीं जैसे- घर बनायंगे तो उसके बीच में आने वाले पेड़ को काट देंगे और कहीं एक पेड़ उसकी जगह लगायंगे नहीं हाँ लिखंगे जरूर कि 'पेड़ लगाना चाहिए'। पेड़ नहीं गाड़ी की पार्किंग जरूर चाहिए उन्हें। मतलब सारा ठेका या ज़िम्मेदारी केवल पहाड़ गाँव के ग्रामीणों की....? आपकी कुछ भी नहीं सिवाय लिखने के।
अल्मोड़ा में हुई इस घटना से गाँव वालों पर ठोस कार्यवाही करना उचित नहीं है हाँ उन्हें समझाबुजागर जागरूक करने की जरूरत जरूर है। गाँव की आजीविका गाँव के जल जंगल जमीन से ही चलती है, ग्रामीण उसी पर निर्भर रहते हैं आधुनिक तकनीक से गाँव गाँव को जोड़ो तो स्वत गाँव की जनता भी जागरूक हो जाएगी।
{क्या करूँ एक पहाड़ी हूँ पहाड़ गाँव की पीड़ भली भांति समझता हूँ....आज भी पहाड़ गाँव के जीवन यापन से रु बरु हूँ। इसलिये दिल से ये बातें निकली....किसी को बुरी लगी होंगी तो मेरी तरह सोचकर देखना एकबार}

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Saturday, June 17, 2017

याद छ महाराज "भरांण"

"भरांण" पहाड़ गाँव के पुराने मकानों की अतिआवश्यक सामाग्री ये लकड़ी के भारी भरकम पिलर, जो घर को बनाने में जरूरी होने वाला ठहरा । पहले तो सारे घर मिट्टी लकड़ी पत्थर के ही बनते थे तो गाँव घरों में जब भी किसी का मकान बनता था या सुधारा(रिपेयर) जाता था तो उसके लिये लकड़ी के भरांण की भी जरूरत पड़ती थी, यह काफी भारी और बड़ा होने वाला ठहरा तो जंगल से इसे लाने के लिये गाँव के सारे युवाओं को बोला जाने वाला ठहरा तो सब लोग मिल जुलकर इस भारी भरकम "भरांण" को  इस तरह जग(ढो) कर लाते थे।

    यह एक तरह से मिसाल ठहरी हमारे पहाड़ गाँव के लोगों की एकता का। अब तो लोहे सीमेंट वाले मकान बनते हैं तो ये सब चीजें ना के बराबर दिखती हैं। आज जो भी इस फोटो को देख रहा होगा उनमें से भी कई मित्रों ने गाँव में यह काम जरूर किया होगा। है ना ????

अब जिनकी पैदाइश शहर में ही हुई उनको तो क्या पता ठहरा ये सब ! लेकिन आने वाली पीढ़ी को इस बात की जानकारी हो कि एक समय ऐसा भी था उसके लिये हमें किसी न किसी माध्यम से अपनी इन यादों को सँजोये रखना तो होगा ही।

 इसीलिए इस वैब के माध्यम से इसे सँजोने का एक छोटा सा प्रयास मैं भी कर रहा हूँ। आशा है आप सब लोगों को पसंद आएगा।

Thursday, June 1, 2017

आल-चांण (हमारे पहाड़ी ढाबे वाले दुकानों की पहचान)

"चाण खै जाये म्यार होटल" आहा
महाराज ये केवल आलू-चने नहीं ठहरे हाँ ये यादें हैं हमारे बचपन की जब स्कूल के दिनों में हाल्फ टाइम(इंटरवल) के वक़्त स्कूल के पास लकड़ी पत्थर और टीन से बनी की कैंटीन से 5 -7- 10 रुपए की पलेट खाते थे, कभी कभार दगड़ियों को खिलाते थे और कभी वो हमें खिलाते थे, पलेट ही नहीं हो कभी कभार तो पैसे कम होने पर कागज में भी खाया ठहरा हमने ये कागज में दिक्कत आने वाले ठहरी क्यूंकी इसका रस ज्यादा होने वाला ठहरा तो सूखा सूखा जी ज्यादा आने वाला ठहरा कागज में, पलेट में तो तरी भी मिल जाने वाली हुई जिसे सुड़काने में मजा आने वाला हुआ। वो तो दिन ठहरे स्कूल के।

  वैसे पहाड़ गाँव के सफर में कहीं भी निकलो तो किसी भी छोटे मोटे ढाबे पर आल-चाण तो मिलेगा ही मिलेगा, फिर चाहे उसमें पुदीने की खटाई(चटनी) डालो या ककड़ी का रायता....सफर में चार चांद लगा देने वाला हुआ। दूर पैदल रास्तों पर चलते चलते जब कहीं कोई ढाबे वाली दुकान मिलती तो बैठने से पहले ही कह देने वाले हुए महाराज एक पलेट गरम गर्म चाण लगे दियौ हो....! दुकानदार चने की पलेट लगाने वाला हुआ और उसके ऊपर एक-आद ताजी ताजी हरी खुस्याणी कोस (मिर्च) रख देने वाला हुआ।

  आहा क्याप स्वाद आ जाने वाला हुआ हो सफर की थकान चट से गायब हो जाने वाली ठहरी। हल्द्वानी से पहाड़ की तरफ जाने वाले रास्ते पर सड़क किनारे मिलने वाले हर छोटे छोटे ढाबों पर आपको जरूर मिलेगा आज भी यह आलू-चना खाने को रायता या खटाई के साथ और साथ में हरी मिर्च। और हाँ बड़े बड़े आलीशान होटलों में मिले ना मिले वो स्वाद और ये आलू-चना मैं कह नहीं सकता.....पर हाँ लकड़ी या टीन के छफर वाले ढाबों पर वही स्वाद जरूर मिलेगा। केवल बड़े बड़े बाज़ारों या रोड के किनारे ही नहीं.....पैदल रास्तों में पड़ने वाले छोटे छोटे गाँव के बाज़ारों में तो अवस्य मिलेगा।

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Monday, May 22, 2017

भांग और भेकुवा'क ल्वात (रेशे)

दगड़ियों मजबूत टिकाऊ ज्योड (लंबी रस्सियाँ), गल्यां (पालतू जानवरों को बांधने की रस्सी) या किसी और छोटे मोटे चीज को बांधने के प्रयोग में आने वाली रस्सियों को बनाने के लिये हम पहाड़ी लोग अक्सर भांग, भेकुवा की लकड़ी, या बाभ्यो घास का ही प्रयोग करते थे, पर अब धीरे धीरे यह भी कम ही होने लगा है।

 इस आधुनिक जीवन में आज पलास्टिक की रस्सियाँ ज्यादा प्रचालन में आने लगी हैं हमारे गाँव घरों में भी अब। तो ल्वात वाले यह नजारे तो दुर्लभ ही हो गए हैं।

भांग या भेकुवा की सुखी लकड़ी से रस्सी बनाने के लिये इन्हें सबसे पहले कुछ दिनों तक पानी के तालाबों पर डुबाया जाता था गाड़ गधेरों के आसपास जिन्हें हम सीमार वाली जगह भी कहते थे, यह नहीं कि इस्तेमाल होने वाले पानी में बल्कि बेकार बहते हुये पानी के स्रोतों के आसपास इन्हें कुछ दिनों तक डुबोया जाता था और इनके ऊपर भारी पत्थर भी रख दिया जाता था जिससे कि ये हल्की लकड़ियाँ पानी के बहाव में बह ना जाएँ, जब यह पूरी तर गीली हो जाती थी तो इनसे वहीं जाकर ल्वात(रेसे) निकाल कर लाने वाले हुये, कुछ लोग तो लकड़ियाँ भी वापस ही लाते थे ताकि जलाने के काम आ जाएँ पर कुछ लोग छोड़ आया करते थे।


इन ल्वातों(रेशों) को लाकर फिर घाम(धूप) में सुखाने वाले ठहरे। जब ये सुख जाती थी इनको एक बोरे में रख दिया जाने वाला ठहरा और जब भी फुर्सत हो तो लंबी रस्सी या गल्यां बाटा जाता था किसी जानकार आदमी द्वारा।

ये रस्सियाँ काफी मजबूत होती हैं और तो और बिना रस्सी के भी इन ल्वातों(रेशों) से अक्सर कोई भी चीज बांधी जाती थी जहां पर जरूरत पड़े। तो आज का सलाम अपनी इस विलुप्त होती धरोहर के नाम।




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Friday, May 12, 2017

ओड़ ढुंग (पहाड़ गाँव में जमीन बँटवारे का चिह्न)

हमारे पहाड़ गाँव खासकर कुमाऊँ क्षेत्र में जब किसी भी परिवार में जमीन का बंटवारा होता है तो ओड़ डाला जाने वाला ठहरा जो वैसे तो एक ढुंग (पत्थर) होता है पर उसका मान सम्मान हर पक्ष को करना पड़ता है। घास के मैदान (मांग) हों या खेत हर जगह बँटवारे के वक़्त 'ओड़' से ही उन्हें अंकित किया जाने वाला हुआ।

एक और बात इस "ओड़" के लिये जब कभी हम बचपन में या अब भी खेतों में हल जोतते थे या हैं तो हम से बड़े हमारे बुजुर्ग यह कहते हैं कि ओड़ पर हल नहीं छूने देना, इसको तिराया जाता है इसका ध्यान रहे। इसकी एक वजह तो शायद यह है कि इससे ओड़ उखड़ने का डर रहता है और दूसरा यह कि इस ओड़ का एक तरह से बहुत सम्मान किया जाता है इसे दो पक्षों के बीच समझौता कराने वाला देवता तुल्य पक्ष माना जाता है।

मित्रों में जितना जानता था मैंने लिखने का प्रयास किया....आप लोगों से भी इस विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहूँगा। कृपया कर आप भी इसके बारे में कुछ बताएं....हो सकता है आपके उधर कुछ और कहा जाता हो इसे। हमें भी जानने को मिलेगा।

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Saturday, February 25, 2017

खुश रहने का बहाना मिल गया ठहरा मुझे...पहाड़ गाँव से

हाँ ऐसा ही है बल एक के बाद एक दुख आते रहे इस जिंदगी में...कभी कभी तो लगा था टूट ही गया हूँ मैं, पर अच्छा हुआ कि खुश रहने का तरीका मिल गया मुझे।

gopu-bisht-pahadi
अपने पहाड़ गाँव की लोक संस्कृति, परम्पराओं, जीवन शैली, खान-पान के प्रति एक तरह के गहरे लगाव से आज मुझे खुश रहने का अंदाज मिल गया है।
कई मित्र ये भी जरूर सोचते हैं कि मैं ये क्या झाड़-पात पोस्ट करता हूँ सोशल साईट्स के माध्यम से....तो मैं यही बताना चाहूँगा कि यही तो राज मिला है मुझे खुश रहने का इस वैब की दुनिया के माध्यम से।

यूं तो दिनभर में दुनिया भर से दूर रहने वाले पहाड़ी मित्रों अंजाने (ददा, भूली, दीदी, बैनीयों, कका) लोगों के फोन और संदेश आते हैं.....पर केवल एक ही फोन या संदेश भी मुझे ढेर सारी खुशी दे जाता है।
इस पोस्ट को लिखने से पहले अभी 30 मिनट पहले एक अनजाने भाई (देवेन्द्र) जी का फोन आया था California(US) से बल कह रहे थे दिल जीत लिया यार तुमने....हम पहाड़ से दूर होते हुये भी पहाड़ के पास पहुँच जाते हैं तुम्हारे पहाड़ी विडियो और पोस्टों को देखकर।

यकीन मानिये मेरा हौंसला और बड़ गया....और अपने प्रयास को खुद ही सराहने लगा और वो ही मुझे मुस्कुराहट दे गया।

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धन्यवाद। 

Tuesday, February 7, 2017

भीं...चाल (भूकंप/Earthquake) प्रकृति की एक करवट !

एक बार पढ़ के बताना जरूर दगड़ियों !!

पहाड़ के गाँवों में आकर देखो और पुछो कि ये भूकंप (Earthquake) क्या है ?
गाँव के बुड़े बुजुर्ग यही कहंगे कुछ नहीं हो "भीं....चाल" ठेरा ये मतलब धरती की चाल(चलना) । ना ही वो इस से डरते थे और ना ही उन्हें ज्यादा नुकसान की आसंका ही होती थी वो इसलिये कि उनके बनाए हुये लकड़ी, पत्थर और मिट्टी के गारे के वो घर इस प्राकृतिक के चाल के अनुकूल होने वाले ठहरे। इसीलिए प्राकृतिक आपदा नहीं प्रकृति कि एक करवट कही जाने वाली ठहरी ये !

आपदा तो आधुनिक शब्दावली का नाम हुआ वो इसलिये क्यूंकि आज के समय में प्रकृति द्वारा ली जाने वाली इस छोटी सी करवट से आधुनिक जीवन शैली में काफी उथल पुथल हो जाती है। ज्यादा नुकसान और डर भी आधुनिक मनुष्य को ही है घर में भी और घर के बाहर भी। भले ही कितने ही आधुनिक सयंत्रों से जांच परख कर ऊंचे ऊंचे डिजाइन दार मकानों बिल्डिंगों को बनाते हैं फिर भी थोड़ा सा हिलने में बाहर भागने को मजबूर हैं क्यूंकि मकान या बिल्डिंग्स का भरोसा नहीं कब धड़-धड़ा कर गिर जाये।

अगर यकीन नहीं तो खुद अपने गाँव देहात में पुराने समय के लकड़ी पत्थर के बने हुये घरों में रहने वाले लोगों से जरा पुछो कि भींचाल या भूकंप आने के दरमियाँ वो घरों से निकले या नहीं। उन्हें डर लगा या नहीं....कुछ ज्यादा नुकसान तो नहीं हुआ ?.....मुझे पूरा विश्वास है ज़्यादातर उनका उत्तर होगा !! नहीं !!
इसी के विपरीत उनसे भी जरा पुछो जो आधुनिक प्रणाली से बने घरों में रह रहे हों चाहे कहीं भी हों गाँव या शहर.....उनका जवाब होगा केवल !! हाँ !!

क्या पहले ये भूकंप नहीं आते थे ? क्या आज का मानव कमजोर है ? या क्या पहले के मनुष्य में मजबूती थी खुद में भी और उसके कार्यों में भी और उसकी सोच में भी ? 

आधुनिक मानव को खुद से ज्यादा विश्वास मशीनों पर है खुद से ज्यादा मशीनों के माध्यम से सोचता है खुद से ज्यादा अपनी निर्जीव संपत्ति को खोने की चिंता है इसलिये वो डरपोक है।

पोस्ट सर्वाधिकार सुरक्षति by Gopu Bisht
दिनांक: 07/02/2017      

 
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