Tuesday, May 22, 2018

"दसार" हमारे पहाड़ गाँव में कुछ ऐसे मनाया जाता है श्री गंगा दशहरा


shree ganga dushhera dwar patr 'Ganesh Ji'
Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 'Ganesh Ji'
हर वर्ष जेष्ठ यानि जेठ महीने की शुक्ल पक्ष दसमी को गंगा दशहरा (Ganga Dushhera) के नाम से जाना जाने वाला हुआ कहा जाता है इस दिन माँ गंगा धरती पर अवतरीती हुई थी ! इस वर्ष गंगा दशहरा दिनांक 24 मई 2018 दिन बृहस्पतिवार को है । हमारे देश में हर जगह अलग अलग तरीके से त्योहारों को मनाया जाने वाला ठहरा ! उसी तरह ऐसा कहा जाता है कि गंगा दशहरा पर गंगा स्नान करना शुभ माना जाता है !


हमारे पहाड़ गाँव उत्तराखंड(Uttarakhand) में कुछ अलग तरह से इस गंगा दशहरा पर्व को मनाया जाता है इस दिन लोग बाग़ सुबह सवेरे उठ कर नहा धोकर घरों को गोबर और लालमिट्टी से लिपते हैं और फिर मंदिरों में धुप बत्ती करके देहली और खिड़की दरवाजों पर पंडित जी द्वारा दिया हुआ गंगा दशहरा द्वारपत्र(Ganga Dushhera Dwarpatr) चिपकाया जाता है, और फिर उसपर अछत पिठां भी लगाया जाता है ! 

Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 'Shiv Ji'
Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 'Shiv Ji'
गंगा दशहरा को “दसार”(Dasar) भी कहा जाता है हमारे गाँव में कुछ वर्षों तक ब्रहामंण (पंडित) जी लोग अपने हाथों से बनाकर सुन्दर द्वारपत्र अपने अपने जजमानों को देने घरों पर आते थे सुबह सवेरे इस दिन ! लेकिन अब धीरे धीरे बाजार में बने बनाये आने लगे हैं जिन्हें लोग डाउनलोड (Download) और प्रिंटआउट(Printout) निकालकर प्रयोग करने लगे हैं ! प्राचीन काल से बूढ़े बुजुर्गों की मान्यता है कि इन द्वारपत्रों को लगाने से घर पर प्राकृतिक आपदाओं(Natural Digaster) का भय नहीं होता था !


श्री गंगा दशहरा द्वारपत्र आज भी पहाड़ गाँव के हर घर पर लगाये जाते हैं, ये दिखने में वर्गाकार कागज के टुकड़े पर वृताकार आकार में होते हैं जिसमें घेरे के चारों ओर त्रिभुजाकार डिजाइन बना होता है कमल की फंखुड़ीयों समान और मध्य में अधिकांस भगवान श्री गणेश, माँ गंगा, माँ लक्ष्मी, श्री हनुमान एवं भगवान् शंकर का चित्र बना होता है और उनके चारों ओर एक घेरे में संस्कृत में एक मन्त्र लिखा होता है जो निम्न प्रकार है;
Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 'Ma Laxmi'
Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 'Ma Laxmi'

“अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशम्पायन एव च । र्जैमिनिश्च सुमन्तुश्च पञ्चैते वज्रवारका: ।।
मुनेःकल्याणमित्रस्य जैमिनेश्चाऽनुकीर्तनात् । विद्युदग्नि भयं नास्ति लिखितं गृहमण्डले ।।
यत्रानुपायी भगवान् दद्यात्ते हरिरीश्वरः। भङ्गो भवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा ।।”

जिसका मतलब है ‘अगस्त्य,पुलस्त्य,वैश्भ्पायन,जैमिनी और सुमंत ये पंचमुनि वज्र से रक्षा करने वाले मुनि हैं।‘

आशा है आपको ये जरुर पसंद आयेगा, क्यूँ न अपनी लोकसंस्कृति को संजोने के लिये हम हर बार इन द्वारपत्रों को अपने ईष्ट मित्रों में बांटे गंगा दशहरा के अवसर पर !

मैं एक पहाड़ी हूँ और मैं अपनी ओर से हमेशा यही कोशिश करूँगा कि अपने पहाड़ गाँव की लोक संस्कृति और परम्पराओं को अपने स्तर पर संजो के रखूं !

Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 'Shree Hanuman'
Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 'Shree Hanuman'

आजकल प्रिंटेड दशहरा द्वारपत्रों में अशुद्ध मन्त्र भी देखने को मिलते हैं जो प्रायः गलत है इसका कोई शुभ फल भी नहीं मिलता है! इसलिये आप केवल सही मंत्रों वाले द्वारपत्र ही लगाएँ जो शुभ फल प्रदान करंगे। 



 अपने इस ठेठ पहाड़ी ब्लॉग के माध्यम से मैंने इस बार आप सभी के लिये कुछ श्री गंगा दशहरा द्वार पत्र डिजाइन किये हैं जिन्हें आप डाउनलोड करके प्रिंटआउट निकालकर प्रयोग कर सकते हैं मैं भी यही प्रयोग करता हूँ ! 

Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 'Ma Ganga'
Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 'Ma Ganga'


पहाड़ गाँव से जुड़ी हुई ठेठ पहाड़ी विडियो देखने के लिये आप “Gopu Bisht ‘ठेठ पहाड़ी यूट्यूब विडियो चैनल” देखना न भूलें।  























आप लोग भी डाउनलोड करके प्रिंट आउट निकाल सकते हैं इसका एक साथ....1 शीट में चार द्वारपत्र निकल जायांगे। लीजिये.... 
Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 2018
1st Sheet

Shree Ganga Dushhera Dwarpatr 2018
2nd Sheet

Thursday, March 15, 2018

सोशल मीडिया तक ही सीमित रह गये हैं हमारे लोकपर्व ! क्यूँ ?

phooldei festival uttarakhand fulari
कल हमारे पहाड़ गाँव का लोक पर्व "फूलदेई" था, सुबह से बहुत खुश और उत्साहित सा था मैं यह देखकर कि व्हाट्स'एप्प, फेसबूक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया से दोस्तों नाते रिशतेदारों के "फुलदेई" पर बधाई और शुभकामना संदेश आने लगे थे।

सोशल मीडिया पर इतना उत्साह पिछले कुछ सालों में से इस बार ज्यादा लगा।


कई मित्रों ने अपनी ओर से अच्छा प्रयास भी किया था जैसे कि एक पहाड़ी मित्र श्री विनोद गढ़िया जी ने सुंदर मनमोहक फुलदेई, वालपेपर और फ्रेम बनाया जो कि लगभग हर पहाड़ी के मोबाइल और सोशल मीडिया प्रोफाइल, पेज, ग्रुप में जरूर पहुंचा था किसी न किसी माध्यम से।
Phooldei-festival-2018-Vinod-Gariya-Gopu-Bisht-phooldeyi
टीम Pandvas की बनाई गई डॉक्यूमेंटरी भी बहुत चर्चित रही और तो और नेशनल टीवी समाचार NDTV ने भी उसे प्राइम शो में स्थान दिया। कई यूट्यूब चैनलों की विडियो भी शेयर हो रही थी फुलदेई पर बनी हुई। मतलब ये कि बाढ़ सी आ गई थी सोशल मीडिया पर 'फूलदेई' की।
शाम ढलते ढलते कई जगह से पता लगा कि घरों पर बच्चे ही नहीं आये "फूलदेई" मनाने। हल्द्वानी से एक मित्र लिखते हैं....हल्द्वानी में क्यूँ लोग फूलदेई नहीं मनाते? अल्मोड़ा से एक मित्र लिखते हैं इस बार एक भी बच्चा नहीं आया घर पर फूलदेई मनाने। और तो और गाँव से ईज़ा ने फोन में बताया कि छोटी बहन और मेरे छोटे भतीजे ने ही मोहल्ले में फूलचढ़ाये घरों की देहली पर जबकि मोहल्ले में और भी बच्चे हैं। ऐसा क्या हो रहा है कि अपने लोकसंस्कृति और अपनी परम्पराओं के लिये इतनी उदासिनता।

हम तो ऐसे नहीं थे, हमने तो अपने बचपन में अपने लोकपर्वों को बढ़ी ही उत्सुकता से मनाया है। फूलदेई के लिये क्या बाजार से 10 रुपए के फूल ला कर हम अपने घर की देली पर कुछ चाँवल के दानों के साथ नहीं चढ़ा सकते थे, अगर ऐसा करते हुये सोशल मीडिया में पोस्ट करते तो शायद औरों की उत्सुकता और बढ़ती।


ये किस ओर जा रहे हैं हम, हमारी लोकसंस्कृति हमारी, बोली भाषा हमारी असल पहचान अब केवल सोशल मीडिया तक ही सीमित होने जा रही है धीरे धीरे। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अपने बचपन को अपने बच्चों से शेयर करें उन्हें अपनी लोकपरम्पराओं के बारे में बताएं, ये कोई मैटर नि करता है कि हम कहाँ रहते हैं गाँव में या शहर में, पहाड़ में या परदेश में। पर क्या हम लोग जहां हैं वहीं अपनी लोकरीतियों को अपने बच्चों को नहीं बता सकते ? क्यूँ रह गये हैं हम पीछे....? क्यूँ भूल रहे हैं हम अपनी परम्पराओं को ? हम नहीं तो कौन है इसका जिम्मेदार ? क्या कल आने वाली पीढ़ी कोसेगी नहीं हमें जब उनको उनके लोकपर्वों, रीतिरिवाजों के बारे में कुछ पता ही नहीं होगा ?

बहुत चिंतनीय है.....कम से कम एक कोशिश तो कर ही सकते हैं जहां हैं वहीं जैसा हो सके वैसा अपनी परम्पराओं का मान रखें। बस छोटी सी कोशिश....मैं कर रहा हूँ, थोड़ी आप से आशा है....आज से अभी से।
धन्यवाद मैं Gopu Bisht एक पहाड़ी

Monday, March 5, 2018

कुछ ऐसा हुआ करता था हमारा वो दौर बोर्ड परीक्षाओं का


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आज से उत्तराखंड बोर्ड परीक्षा शुरू हो गई हैं, तो मन में कुछ यादें अपने दौर की आ गई ठहरी। आज से कुछ वर्षों पहले लगभग 2002-05 तक हाईस्कूल-इंटर की बोर्ड परीक्षा अपने गृह स्कूल में नहीं होने वाली ठहरी, परीक्षा सेंटर किसी और ही स्कूल में हुआ करता था। तो महाराज मेरे हमउम्र और मुझ से बड़े सभी को याद ही होगा ना कि किस तरह हम परीक्षा देने दूर सेंटरों में जाया करते थे, घर वाले 2-3 महीने पहले से ही रहने का ठौर ठिकाना ढूंढ लेते थे वहाँ, या तो किसी नजदीक के रिश्तेदार के वहाँ या दूर के रिश्तेदार के वहाँ या फिर किराए में। ज़्यादातर लोगों का ठिकाना रिश्तेदारी में ही होने वाला ठहरा। ग्रामीण इलाकों के सेंटर मुख्यतया बाजार वाले सेंटरों में हुआ करता था ! अब हम ठहरे ग्रामीण इलाकों के हाईस्कूल-इंटर कॉलेज में पढ़ने वाले तो...हमारा सेंटर था गंगोलीहाट जो हमारा मुख्य बाजार और तहशील ठहरा। मार्च में शुरू होने वाली परीक्षा अप्रैल मई तक भी चलने वाली हुई...पेपरों के बीच में 2 से 7-8 दिन का भी गैप हो जाने वाला हुआ कभी कभार। इसी बीच होली भी होने वाली हुई इन दिनों....तो होली की भी छुट्टी होने वाली ठहरी आगे पीछे।
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   इन दिनों बाज़ारों या गाँव घरों में रौनक सी आई रहने वाली ठहरी...जहां एक ही स्कूल के छात्र छात्रायेँ तो होते ही थे साथ ही अलग अलग स्कूलों के छात्र छात्राओं से भी मेल जोल हो जाने वाला हुआ, दोस्ती टाइप हो जाने वाली ठहरी या तो किराए पर रहने की वजह से या बाजार, गाँव घरों में रिशतेदारों में रहने की वजह से। अब जैसा कि हमारे पहाड़ गाँव में देखने को मिल ही जाता है बाजार हो या गाँव पानी के स्रोतों पर पानी लेने दूर दूर से पहुँचने वाले हुये....वहीं पर एक दूसरे से मिलन होने वाला हुआ, या फिर परीक्षा सेंटर पर परीक्षा हॉल में और आते जाते रास्तों पर।
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मैं भी अपने छोटे मामा लोगों के वहाँ पर था जब हाईस्कूल के पेपर थे मेरे। अब गंगोलीहाट में उस टाइम पे पानी की काफी समस्या थी कुछ एक जगहों पर हैंड पंप थे तो कुछ एक स्थानो पर वही प्राकृतिक जल स्रोत नौले धारे। हम लोग जान्धेवी के नौले से लाया करते थे वो भी सुबह 3:30 - 4 बजे। नौले धारों पर काफी भीड़ होने वाली ठहरी सुबह से शाम तक। किसी किसी के साथ परीक्षा के दिनों में उसके घर वाले आने वाले ठहरे खाना पीना बनाने के लिये तो कोई कोई दो चार लड़के या लड़कियां साथ में कमरा लेकर रहते थे तो काम भी बंट जाने वाला हुआ और कोई कोई खाना बाजार से खाने वाले हुये....बाँकी रिश्तेदारी वाले हुये हम जैसे जिन्हें बस अपनी परीक्षा में ही फोकस करना हुआ क्यूंकि बना बनाया सबकुछ मिल जाने वाला हुआ।
उसी समय वहीं नहा धोकर भी आने वाले हुये। क्यूंकी जैसे जैसे उजाला वैसे वैसे भीड़। हैंड पंप और
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पेपरों के दौरान चैत्र की अष्टमी भी आने वाली ठहरी जब गंगोलीहाट में कौतिक(मेला) लगने वाला ठहरा.....असली मेला ठहरा हो उन दिनों दिगौलाली। बाजार में काफी रौनक ठहरी उन दिनों। जब पेपरों में गैप होने वाला हुआ तो उस दिन पेपर देने के बाद घर को जाने की जल्दी होने वाली ठहरी छुट्टियों में। मेरे बाज्यू(पिताजी) मना करने वाले ठहरे घर आने को....कहते थे क्या है घर पढ़ाई करना वहीं, वहाँ खाना नहीं मिलता है क्या...? वगैरा वगैरा। फिर भी महाराज....5-6 दिन के गैप वाली छुट्टियों में तो चले ही जाने वाला हुआ घर, फिर भले ही थोड़ी डांठ ही क्यूँ न खानी पड़े॥

   बोर्ड पेपरों के दौरान काफी दोस्त बन जाने वाले हुये....नये नये, मोबाइल का तो उन दिनों चलन ठहरा ही नहीं मोबाईल फोन हमारे कॉलेज पहुँचने पर मिला ठहरा हमें इसलिये फिर कभी उनसे मुलाक़ात जैसे बाजार में, किसी गाँव में शादी में या कहीं और हुआ करती थी तो हाल चाल पुछने ही वाले ठहरे अच्छा लगने वाला हुआ।
परीक्षा समाप्ती के बाद अपने अपने घरों को लौट जाने वाले हुये, और फिर रिजल्ट का इंतजार करने वाले हुये। रिजल्ट जब आता था तो अखबार में लिस्ट आने वाली ठहरी....इन्टरनेट का हम जानने वाले ही नहीं ठहरे। 1.50रुपए वाला अखबार भी रिजल्ट के दिन 10 से 20 रूपये में खरीद कर लाये ठहरे बाबू। रिजल्ट कोई खास नहीं आया ठहरा फिर भी हाईस्कूल में पास हो गया करके बाज्यू बाजार से टॉफी, बिस्कुट, जलेबी लाये ठहरे और मोहल्ले में सबको बांटा ठहरा खुशी से।
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   ऐसा ही था हो हमारा वो दौर....बोर्ड परीक्षाओं का मीठा सा अच्छा सा....हसीन। आज तो बस हाय तौबा, कंपटीशन ही कंपटीशन। आज न खुशी है न चैन....पर तब था खुशी चैन और शकुन।
खैर सभी परीक्षार्थियों को पुनः भौत भौत शुभकामनायें।  

पोस्ट सर्वाधिकार सुरक्षित by Gopu Bisht

Sunday, February 25, 2018

कुमाऊँ क्षेत्र में गाई जाने वाली खड़ी होली कलेक्शन

हमारे कुमाऊँ क्षेत्र की बैठकी होली और खड़ी होली बहुत चर्चित है खासकर खड़ी होली जो फाल्गुन माह की शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन से शुरू होती है और छलड़ी(होली के अंतिम दिन) यानी पूर्णिमा तक चलती है !
      मेरे गाँव टुन्टा, गंगोलीहाट में गाई जाने वाली खड़ी होली का इस बार बैनर/पोस्टर बनाने का प्रयास किया है आशा है पसंद आयंगी ! क्यूँ न हम होली के इस शुभ अवसर पर इन होली पोस्टरों को शेयर करें ताकि गाँव की वो पुरानी यादें ताज़ी हो जाएँ ! समय के साथ साथ अब धीरे धीरे वो नज़ारे और वो होलियाँ अब गाँव में भी नजर नहीं आती हैं !
यह एक तरीका है जिससे हमारे आने वाली पीढ़ी के लिये ये चीजें संजोये रखी जा सके !

लीजिये लुप्त उठाइए गाँव में गाई जाने वाली खड़ी होलियाँ !

होली नंबर :1  { शिव के मन में बसे काशी ! Shiv ke man me base kashi}

शिव के मन में बसे काशी-Shiv ke man me-khadi holi


                                   होली नंबर : 2 {झुकी आयो शहर से ब्योपारी !! Jhuki aayo shahar se vyopari}

झुकी आयो शहर से ब्योपारी-Jhuki aayo shahar se vyopari-khadi holi




होली नंबर : 3 {धरती जो बनी है अमर कोई !! Dharti jo bani hai Amar koi}

धरती जो बनी है अमर कोई-Dharti jo bani hai Amar koi-khadi holi


































                                          होली नंबर : 4 {सैयां मेरो मोहिया कदिआवे; Saiya mero mohia kadiaawe}
                                                     
सैयां मेरो मोहिया कदिआवे-Saiya mero mohia kadiaawe-khadi holi 
                                                                                                                                                                                                          

 
होली नंबर : 5 {बलमा घर आवे कौन दिना; Balama Ghar aawe Kaun Dina}

बलमा घर आवे कौन दिना; Balama Ghar aawe Kaun Dina-khadi holi


































                                                                   होली नंबर : 6 {कंकड़ कुवां खुदाई के अयोध्या महल लगाय}
                                                                         (Kankad kuwan khudai ke Ayodhaya Mahl lagay)
कंकड़ कुवां खुदाई के अयोध्या महल लगाय-kankd kuwan khudai ke-khadi holi




































होली नंबर : 7 {होली कैसे खेलें हरी}                                                                        
(Holi kaise khelen Hari)

होली कैसे खेलें हरी-Holi kaise khelen Hari-khadi holi




































                                                                             होली नंबर : 8 {ब्रज मण्डल देश देखो रसिया}
                                                                                           (Braj Mandal desh dekho Rasiya)

ब्रज मण्डल देश देखो रसिया-Braj Mandal desh dekho Rasiya-khadi holi

Thursday, February 22, 2018

Pahadi Video | एक ठेठ पहाड़ी का अपनी लोकसंस्कृति को सँजोने का प्रयास





 पहाड़ गाँव से सम्बंधित ये ठेठ पहाड़ी youtube विडियो चैनल आज हर पहाड़ी की पसंद बनता जा रहा है, दुनिया भर में फैले प्रवासी पहाड़ी भाई लोग इस चैनल को बहुत सराह रहे हैं.

इस ठेठ पहाड़ी चैनल में हमारी लोक संस्कृति और पारम्परिक रीती रिवाजों पर आधारित विडियो का कलेक्सन है जिसमें खान पान, भेष भूषा, रहन सहन, तीज त्यौहार, धार्मिक, सांस्कृतिक कार्यकर्मों का मिश्रण है !

Monday, January 29, 2018

टैम हैं पैलि खिलन भैगो "बुराँस" पहाड़ों में

खुशनुमा बसंती मौसम'की शुरुआत हूण भैगे !
पहाड़'क डानन में प्योंली और कफूवा(बुराँस) ले टैम हैं पैलि खिलन भै गईं। बुराँस 'क यह फूल नाम'की न्याति सुंदर और खूबसूरत हुंछ, म्यार सबसे पसन्दीदा फूल छू यो, जब ले देखछीं येके तोड़ी भेर आपुण पास राखना'क मन हुंछी पर कभे तोड़न'क मौक नि लागि बस बाट पैन उन-जान देखते रुंछी, ये बारी देखौ तो तोड़ि बिना रै नि सक्यूं ।
 कई प्रकारक औषधीय गुण हुनी ये में, ये बुराँस'क फूल'क बोट(बृक्ष) हमार देवभूमि उत्तराखंड 'क राज्य बृक्ष ले छू। आब ग्लोबल वार्मिंग'क यौस असर हूण भैगो कि चैत-बैशाख 'क मैहैंण खिलन्ही वाल यो फूल द्वि चार मैंहैंण पैलि माघ-फाल्गुन में खिलन भैगो कुछ सालों भटी,  यो चिंतनीय छ....  !!
burans-kafuwa

मार्च अप्रैल'क मैंहैंण में पहाड़'क डान(जंगल) में लाल पट ह्वे जाली और वातावरण ले महक उठली ।
बुरांस'क जूस भौते बढ़िया हुंछ  दिगौलाली स्कूल टैम में भौते पी राखी जब गढ़वाल साइड छ्युं।


हिन्दी में
खुशनुमा बसंती मौसम की शुरुवात होने लगी है।
पहाड़ के जंगलों में प्योंली और कफूवा (बुराँस) के फूल भी समय से पहले ही खिलने लग गए हैं। बुराँस का यह फूल अपने नाम की तरह ही सुंदर और खुबसूरत होता है, मेरा सबसे पसंधिदा फूल है ये, जब भी देखता था थोड कर अपने पास रखने का मन होता था पर कभी तोड़ने का मौका नहीं लगा बस आते जाते रास्तों पर देख कर ही मन को तसल्ली दे देता, इस बार देखा तो तोड़े बिना रह नहीं पाया। कई प्रकार के औषधीय गुण होते हैं इस फूल में, इसका बृक्ष हमारे उत्तराखंड राज्य का राज्य बृक्ष है। अब कुछ सालों से ग्लोबल वार्मिंग की वजह से यह फूल चैत बैशाख में ही दो चार महीने पहले खिलने लगा है पहले यह माघ फाल्गुन के महीने खिलता था, यह चिंतनीय विषय है।

गर्मियों में मार्च अप्रैल के महीने पहाड़ के अधिकांश जंगल इन फूलों के खिलने की वजह से लाललिमा बिखेरेंगे। और वातावरण महक उठेगा।
बुराँस के इस फूल का जूस भी बहुत अच्छा होता है स्कूल के दिनों में बहुत पी रखा है जब गड़वाल साइड था।

ये भी कुछ जरिया हैं मेरे पहाड़ गाँव को महसूस करने के आप देख सकते हैं।

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