Saturday, April 6, 2013

आस्था का एक केन्द्र महाकाली गंगोलीहाट मंदिर

Haat-Kalika-Gangolihat
जैसा कि दोस्तो हम सभी जानते हैं नवरात्रों में देवी पूजा का विशेष महत्व है, और इस अवसर पर 'हाट कालिका' का जिक्र कहीं न आए ऐसा कम से कम कुमाऊं क्षेत्र में तो बिलकुल संभव नहीं है। आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित महाकाली शक्तिपीठ में मत्था टेकने के लिए पूरे नवरात्रों में देश के कोने कोने से भक्तजन यहाँ पहुंचते हैं। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित स्कंद पुराण के मानसखंड में इस आदि शक्ति पीठ का विस्तार से वर्णन है। 

उत्तरांचल के पिथौरागढ़ जिले में मन को अति लुभाने वाली एक नगरी गंगोलीहाट है। मुख्य बाजार से लगभग 1 किलोमीटर दूरी पर देवदार के झुरमुट के मध्य प्राचीन 'माँ भगवती महाकाली' का अदभूत मंदिर है। इस मंदिर को चाहे पौराणिक दृष्ठी से देखेँ या धार्मिक दृष्टि से हर स्थिति में यह पूर्णतया सभी आने जाने वाले भक्तों का मनमोहने में सक्षम है।

 यहाँ आने वाले हर एक भक्त यही कहता है कि श्रद्धा से जो भी व्यक्ति माँ भगवती के चरणों में आराधना करता है उसके सभी प्रकार के रोग, विकार, दरिद्रता एवं कष्टों का अंत हो जाता है। यही कारण है जो पूरे साल भर दूर दूर से लाखों श्रधालु माँ के दरवार में आते हैं और वो ये भी बताते हैं कि कैसे माँ माहाकाली ने उनकी सारी मनोकामनए पूरी की।
विदेशी पर्यटकों का भी यहाँ भारी मात्रा में साल भर तांता लगा रहता है। माँ काली के दर्शन पाकर वो लोग बहुत ही धन्य बताते हैं अपने आपको। 

चमत्कारों से परीपूर्ण  इस माँ भगवती के दरवार में समय समय पर शतचंडी महायज्ञ, अष्टबलि अठवार, सहस्त्र चण्डी यज्ञ, आदि का पूजन समय-समय पर आयोजित होता रहता है। यही माँ का एक ऐसा दरवार है, जहां पूर्णिमा हो या अमावस्या प्रति दिन हवन यज्ञ होते हैं। जब कभी मंदिर में शतचंडी महायज्ञ का आयोजन होता है तब माँ के इस  दरबार की आभा और भी देखने लायक हो जाती है। उस समय प्रतिदिन १०८ ब्राह्मणों द्वारा शक्ति पाठ की गूंज से चारों ओर भक्ति की गुंजायमान से ऐसा प्रतीत होता है  मानों समस्त देवी देवता शैल पर्वत पर आकर रहने लगे हों। 

माँ के इस मंदिर में पूजा पाठ का कार्यक्रम अर्ग्रोन गांव के पंत लोग सम्पन्न कराते हैं, उनकी अनुपस्थित में यह दायित्व हाट गांव के पाण्डेय निभाते हैं।

रामगंगा एवं सरयू नदी के मध्य बसे गंगावली की सुंदर घाटी में स्थित भगवती के इस पावन  स्थल की बनावट त्रिभुजाकार बतायी जाती है, और यही त्रिभुज तंत्र शास्त्र के अनुसार माँ भगवती का साक्षात् यंत्र है।

यहां हर कोई धनहीन धन की इच्छा से, पुत्रहीन पुत्र की इच्छा से, सम्पत्तिहीन सम्पत्ति की इच्छा से सांसारिक मायाजाल से विरक्त लोग मुक्ति की इच्छा से प्रति दिन आते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ण पाते हैं। 

आजादी से पहले गंगावली के इस क्षेत्र में मोटर यातायात की कोई भी सुभीधा नहीं थी फिर भी पैदल यात्रा से यात्री यहां की नैसर्गिक सौंदर्य का आनन्द लेने आया करते थे।

माँ के इस दरवार मे जब कभी भी पूर्व में सहत्रघट का भव्य आयोजन किया जाता था तो रामगंगा एवं सरयू नदी से भक्तजन माँ के जयकारों के साथ गागरों में पानी भर के  लाते थे, और इसके साथ साथ प्राचीन जल श्रोतों (नौलों, धारों) से भी ताबें की गंगरियों में जल लाकर इस शक्तिपीठ में जलाभिषेक करते थे। उस समय  में गंगावली की इन सुंदर वादियों का नजारा दिव्य लोक सा मालूम पडता था।
इस 'सहत्रघट' का आयोजन तब किया जाता था, जब बहुत लम्बे समय से क्षेत्र में वर्षा नहीं होती थी। इस आयोजन के सम्पन्न होने के पश्चात सायंकाल के समय घनघोर मेद्य ललाट भरे बादल जो रौद्र रूप का प्रतिबिम्ब मालूम पड़ते थे, अपने साथ वर्षा की अनुपम छटा लाते थे। आधुनिकता के इस दौर में भी इस परम सत्य का नजारा सहत्रघट आयोजनों के अवसर पर यहां देखा जा सकता है। 

ये भी एक कहावत कही जाती है यहाँ, कि जब विश्व युद्ध  के समय भारतीय सैनिकों से खचाखच भरा एक जहाज समुद्र में डूबने लगा तो उसी जहाज में इस क्षेत्र के उपस्थित एक सैनिक ने माँ काली को याद कर डूबते जहाज को इस तरह से उबरवाया कि समुद्र की वादियों और पूरा जहाज जय 'श्री महाकाली गंगोलीहाट' वाली की जय-जयकार से गूंज उठा। तभी से भारतीय सैनिकों की इस मन्दिर के प्रति विशेष आस्था है। 

लगभग ३८,९३७ हैक्टेयर भौगोलिक क्षेत्रफल में फैलै इस गंगावली क्षेत्र में शिवालयों एवं देवी शक्तिपीठों की भरमार है, जिनमें चामुण्डा मंदिर, लमकेश्वर महादेव मंदिर, कोटेश्वर, गुप्तेस्वर, रामेश्वर मंदिर, विष्णु मंदिर, गोदीगाड मंदिर के अलावा पाताल भुवनेश्वर, भोलेश्वरहटकेश्वर, शैलेश्वर, मर्णकेश्वरचमडुगरा आदि प्रसिद्ध शिवालय हैं।

माता भगवती महाकालिका का यह पावन दरवार बहुत सारे अलौकिक दिव्य चमत्कारों से भरा पडा है। जिसका वर्णन करने में कोई भी समर्थ नहीं है।

इस माँ के दरवार के बारे में एक किवदन्ति ये भी है कि जब रात में माँ भगवती का  डोला चलता है तो इस डोले के साथ माँ के गण, आंण व बांण की सेना भी चलती हैं। कहते है यदि कोई व्यक्ति इस डोले को छू ले तो दिव्य वरदान का भागी बनता है। माँ का ये डोला हाट गांव के चौधिरयों द्वारा महाकालिका को चढायी गयी २२ नाली खेत में में चलने की बात कही जाती है। 

रात्री में महाआरती के बाद मंदिर में शक्ति पीठ के पास महाकाली माँ का विस्तर लगाया जाता है और प्रातः काल जब उस विस्तर को देखा जाता है तो ऐसा लगता है कि मानों यहां साक्षात् माँ कालिका विश्राम करके गयी हों क्योंकि विस्तर में सलवटें पडी रहती हैं।

जो यहाँ पशुबलि प्रथा है उसके बारे में कुछ बुर्जग लोग बताते हैं कि पशु बलि माँ को नहीं दी जाती है, क्योंकि जगतमाता अपने पुत्रों का कभी बलिदान नही लेती है। यह बलि माता के खास गण करतु को प्रदान की जाती है।

प्राचीन काल में स्थानीय क्षेत्र तामानौली के औघड बाबा भी कालिका माँ के भक्त रहे हैं।माँ काली के प्रति उनके तमाम किस्से आज भी इस क्षेत्र में सुने जाते है। 
 

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