Tuesday, December 10, 2013

पहाड़ की चिट्ठी (Pahad ki Chitthi)

आपुण पहाड़ हैं दूर रुन्ही म्यार सबै पहाड़ी भाई-बैणियो...

एक बात हमेशा याद राखिया जिंदगी में अघिंल बडन भौते जरूरी छ, पर विकै लिजी इतू अघिल झन जैया कि आपुण पहाड़, आपुण मुल्क छूटी जाओ और फिर यौई सोचन में रे जावो कि 'म्यार गौं, म्यार मुल्क, म्यार जन्मभूमि आब म्यर नैहाँ ! कभे ले यौस झन कया कि यौ पहाड़ आब पैलि जौस नी रईज्ञों। आज ले यां ऊई बारमास बेड़ू पाकनी, हिसालू, किलमडी, काफल पाकनी, कफूवा, प्योंली खिलनी, ठ्ंडो पानी, ठंडी बयार हुनी, कौतिक न में झवाड़, छबेल, चाँचरी लागनी ऊई हुड़ुक, तुरी, दम्मू, नगांड बाज्नी।  कतु कै ले दूर न्है जावो, यो पहाड़ कणी के दिन बार भेटने रया । यो तुमर पहाड़ छू क्वे पछ्यानों या नै पर यो पहाड़ तुमुकै जरूर पछयाण ल्यौल! पहाड़ तुमन छै कुणों तुम हगील बढ्ने रैया, खूब तरक्की करीया पर मी कै ले कभते कभते बख़्त दीनै रैया। मी तुमर आशी लागी रून, हर बख्ते तुमर बाट चे रून।    

                                                                                                         तुमर आपुण पहाड़, तुमरी जन्मभूमि !

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