Monday, October 20, 2014

मेरे गाँव (पहाड़) का 'दुतिया त्यार' या 'भैया दूज' पर्व !

हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की दुतिया/द्वितीया तिथि को होने वाले भैया दूज पर्व को मेरे गाँव (पहाड़) में 'दुतिया त्यार (पर्व)' के नाम से भी जाना जाता है। जैसा की हम सब जानते हैं यह पर्व भाई-बहन के प्यार के अट्टूट रिश्ते को समर्पित है।

हमारा पहाड़(उत्तरांचल) यूं तो अपनी लोक संस्कृति के लिये काफी प्रसिद्ध है। कई तरह के त्योहार मनाये जाते हैं हमारे पहाड़ में उनमे से ही एक है यह "दुतिया पर्व"। हमारे पहाड़ के गाँवों में इन त्योहारों का बड़ा ही महत्व है। और इन्हें मनाया भी पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ है। इस पर्व को मनाने की रश्म भी हर जगह अलग अलग है। आज में आपको अपने गाँव में इस 'दुतिया पर्व' को मनाने के बिषय में जानकारी दूंगा।

इस दुतिया पर्व के लिये हमारे गाँव घरों में कई दिन पहले से ही तैयारी होने लगती है। वैसे तो असौज-कार्तिक का यह महिना गाँव में काफी काम काज के लिये माना जाता है क्यूंकि इन्हीं महीनों में फसल एवं घास कटाई का अत्यधिक काम होता है। फिर भी 'त्यार' तो त्यार ही होता है उसके लिये किसी प्रकार की कमी नहीं की जाती है।

धान के च्युड़ेहमारे यहाँ इस दुतिया पर्व के लिये 'धान के च्युड़े' बनाये जाते हैं। गाँव में कुछ लोग तो दुतिया से 7-8 दिन पहले ही इन च्युड़ों को बना लेते हैं और कुछ दुतिया के पहले दिन ही बनाते हैं। इन्हें बनाने के लिये 2 दिन पहले धान(चाँवल के बीज) को एक बर्तन में (अधिकांस रूप से लकड़ी की छोटी डलिया, या टीन की बड़ी छलनी) भीगा दिया जाता है। उसके बाद तीसरे दिन सुबह-सबेरे या शाम के समय इन धान को कुटा जाता है। इन च्युड़ा के धान को कुटा भी एक अलग तरीके से है।

सबसे पहले तो ओखली के नजदीक में ही आग की अंगेठी या चूल्हा लगाया जाता है फिर उसमें एक लोहे की पुरानी कढ़ाई रखी जाती है। उसके बाद कढ़ाई गर्म होने पर उसमें छोटी सी मात्रा में घी या मक्खन डाला जाता है। फिर थोड़े से धान डाले जाते हैं ओखली में कुटने के हिसाब से, उन्हे कुछ देर तक भुना जाता है जब वो थोड़े से सुनहरे हो जाते हैं तो उन्हें ओखली में डालकर कुटा जाता है। इसी तरह से सारे भिगाये हुये धानों को कुटा जाता है।  इन्हें कूटते समय एक ये बात भी प्रचलित है कि जो सातवीं बार और आठवीं बार कुटा जाता है उन्हें लड़के और लड़कियों में बांटा जाता है। सातवीं बार वाला हिस्सा लड़कियों का और आठवीं बार वाला हिस्सा लड़कों को दिया जाता है। जो उसी समय खा सकते हैं बाँकि दुतिया पर्व के ही बाद च्युड़ा को खा सकते हैं उस से पहले नहीं।

ये तो थी 'दुतिया पर्व' का विशेष च्युड़ा बनाने संबंधी जानकारी। अब दुतिया पर्व को हमारे गाँव में किस तरह से मनाया जाता है वो जानिए।

दुतिया के दिन सुबह नहा-धोकर सबसे पहले घर की लिपाई पोताई की जाती है फिर घर के मंदिर में पूजा की जाती है और जो च्युड़ा बनाये होते हैं उन्हें भगवान को चड़ाये जाते हैं और साथ ही एक कटोरे में तोड़ा तेल और उसमें दुब घास भी रखी जाती है। उसके बाद घर की महिलाएं अपने पति-बच्चों और अन्य लोगों के सिर में च्युड़ा डालती हैं बिल्कुल हरेले की तरह लेकिन उस से पहले कटोरे में रखे हुये तेल को दुब घास से पैरों में-फिर घुटने पर-फिर कंधे पर- और फिर सर पर छुवाया जाता है। इसी तरह से घर की लड़कियां अपने माँ-बाप और भाई-बहनों और परिवार के अन्य सदस्यों के सर ये च्युड़ा डालती हैं।

घर में तरह-तरह के पकवान भी बनाये जाते हैं जैसे- पूरी, कचौड़ी(बेड़ी लगड़), खीर, पुवे इत्यादि। ये सब करने के बाद अधिकांस विवाहित महिलाएं अपने माईके को जाती हैं, अपने भाई के सर च्युड़ा डालने।

फून-fun
और इन सभी के साथ-साथ इस दिन हमारे गाँव(पहाड़) में बैलों और बछड़ों को भी पूजा जाता है। इसके लिये बैलों के सिर-सिंघ और जुड़े पर तेल लगाया जाता है, फिर उन पर अछ्त-पीठा (टीका) लगाया जाता है। उसके बाद उनके सिर पर रामबांस के रेस्सों से या भांग की डोरियों से बनाया हुआ फूल की तरह का एक-एक "फून" बांधा जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है। बैलों की पीठ पर नाली या माड़ (लकड़ी का बना हुआ अनाज मापने वाला एक बर्तन) से भिगोये हुये सफ़ेद खड़िया से गोल गोल आकृति भी बनाई जाती है जिसे धापना कहते हैं। फिर उन्हें भी एक-दो पूरी और पुवे खिलाये जाते हैं।

गाँव में बने मंदिरों में भी जाकर च्युड़े चड़ाए जाते हैं। तो दोस्तो इस तरह से होता है यह पावन "दुतिया पर्व" मेरे गाँव में। शायद आप के गाँव में भी इसी तरह से होता होगा या थोड़ा बहुत अलग। यही हमारी लोक परम्पराएँ हैं जिन से हम जुड़े हुये हैं....पर आधुनिकता की इस भाग-दौड़ में अब ये धीरे धीरे कम होती जा रही हैं।

मुझे पूर्ण आशा है की आपको मेरा यह ब्लॉग जरूर पसंद आया होगा। बस यह मेरा एक छोटा सा प्रयास है अपनी लोक परम्पराओं को जीवित रखने का। आप भी अपने विचार मेरे साथ जरूर सेयर करें। मुझे भी खुशी होगी।

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Thursday, October 9, 2014

'स्वांल या स्वाल पथाई' कुमाऊँ की एक अनूठी रश्म !

'स्वांल पथाई' कुमाऊँ की एक अनूठी रश्म है! यह रश्म उत्तराखंड के कुमाऊँ मण्डल क्षेत्र के अधिकांस हिस्सों में प्रचलित है। यह रश्म जनेऊ संस्कार और शादी में आयोजित की जाती है।

स्वांल या स्वाल पथाई
पहले के समय में या कहीं कहीं अब भी जब किसी का द्वि दिवसीय जनेऊ संस्कार पुरानी रीति रिवाजों के आधार पर किया जाता था या किया जाता है उस अवसर पर प्रथम दिन यानि की 'ग्रहजाग' वाले दिन स्वांल पथाई की यह रश्म निभाई जाती थी या है। पर अब अधिकांस जगहों पर इन पुराने रीति रिवाजों के आधार पर जनेऊ संस्कार बहुत कम देखने को मिलता है इसलिये स्वांल पथाई की यह रश्म भी अब केवल शादीयों के अवसर पर ही देखने को मिलती है।

इस रश्म में घर और गाँव की महिलाओं द्वारा सर्वप्रथम आटे को गूँथ कर उस से गणेश जी की प्रतिमा और स्वस्तिक बनाया जाता है और फिर पुरियाँ बेली जाती हैं जो कुछ समय बाद पकाई जाती हैं जिन्हें "स्वांल" कहा जाता है। ये स्वांल और पुरियों से थोड़ा सक्त होती हैं।

शादी के अवसर पर यह रश्म दुल्हा और दुल्हन दोनों के वहाँ होती है। शादी के पहले दिन इस रश्म का आयोजन किया जाता है। जिसमें गाँव की महिलाएं और घर की महिलाएं हिस्सा लेती हैं। स्वांल को पकाने के बाद हल्वे(आटे का) के साथ पूरे गाँव में बांटा जाता है।

हमारे पहाड़ की ये लोक परम्पराएँ हमारी असली पहचान हैं।

दोस्तों 'स्वांल पथाई' के बारे में जितना मैंने देखा और सुना है उतना आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर दिया है....आप भी अगर कुछ इस से अधिक इस खुबसूरत रिवाज के बारे में जानते हैं तो कृपया हमारे साथ जरूर सेयर करें।

'स्वांल पथाई' कुमाऊँनी शादी की एक अनूठी रश्म पूरी विडियो




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