Tuesday, August 11, 2015

मेरे पहाड़ गाँव का 'घी त्यार' यानि 'घी संक्रांत' पर्व

प्रकृति का भरपूर और सुंदर नजारा अगर कहीं है तो वो है हमारी देवभूमि उत्तराखंड, जो उत्तर के आँचल में हिमालय की गोद में बसा एक खुबसूरत प्रदेश है जिसे उत्तरांचल के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल से ही यहाँ की लोक संस्कृति प्रकृति के सभी तत्वों ऊंचे-नीचे पर्वतों, हरे भरे वृक्षो, कलरव करती नदियों आदि के साथ घुली-मिली है।

लोक संस्कृति की असली झलक लोक पर्वों, रीति रिवाजों, परम्पराओं से मालूम पड़ती है। इस प्रदेश में जीतने भी लोक-पर्व होते हैं वो सभी प्रकृति से जुड़े होने की सुंदर छवि प्रस्तुत करते हैं। यूं मान लो कि उन्हीं पर आधारित होती है। प्रकृति के अभिन्न अंग ऋतुओं पर आधारित लोक संस्कृति पहचान है इस खुबसूरत से प्रदेश उत्तरांचल की।

वैसे तो बारों महीने यहाँ कोई न कोई लोक पर्व(त्यार) होते रहता है। लेकिन उसी में से आज मैं बात कर रहा हूँ "घी त्यार" यानि कि 'घी संकांत' की।

हर वर्ष विशेष रूप से उत्तरांचल के कुमाऊँ क्षेत्र में भादौ(भाद्रप) महीने की संक्रांति यानि 1 पैट (गते) की सुबह को या कहीं-कहीं सौंण(सावन) माह की मसांति यानि अंतिम दिन शाम को यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में जैसा कि इसके नाम से ही प्रतीत होता है "घी" खाने का प्रचलन है। इस पर्व पर आधारित यह मान्यता हैं कि जो इस दिन घी नहीं खाता है वो अगले जन्म में गन्याल (घोंघा एक कीड़ा) बनता है। इसलिये इस दिन खाते समय घी का अलग से सेवन जरूर किया जाता है। सभी घरों में इस दिन मुख्य रूप से घी के पकवान बनाये जाते हैं।  

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इस पर्व के अवसर पर 'ओग' अर्थात एक तरह की भेंट देने की भी परंपरा है इस वजह से इसे 'ओल्गी संकांत' भी कहा जाता है इसमें लड़की के ससुराल वाले उसके माईके वालों को (घी, फल, साग [जैसे-कद्दू, लौकी, पिनालु के गाब] खीर आदि) और समाज के कुछ निम्न वर्ग वाले अपने से उच्च वर्ग वालों को (सुई, अंगेठी, दराँती, कुदाल आदि ) देते हैं इसके बदले में उन्हें अनाज या रुपये दिये जाते हैं। कहा जाता है कि यह परंपरा कुमाऊँ के चन्द्र वंशी राजाओं के शासन काल से चली आ रही है जिसमें स्थानीय लोग अपने राजा को घी, दूध, दही और पकवान भेंट करते थे और शिल्प कला में माहिर शिल्पकार अपने द्वारा बनाई गई शिल्पकारी की वस्तुवें भेंट किया करते थे और राजा उन्हें उसके बदले उन्हें पुरस्कार से सम्मानित करते थे।

इसे कृषि और पशुपालन से जुड़ा हुआ पर्व भी मान सकते हैं क्यूंकि इस महीने में बरसात काफी होने के कारण हरी घास भी काफी मात्रा में बड्ने लगती है खेतों और जंगलों में जिस से पालतू जानवरों के लिये न्यार(भोजन) की कोई कमी नहीं रहती है। अधिक न्यार(घास-पात) मिलने से गाय-भैंस भी अधिक दूध देती हैं जिस से धीनाली/दुभेंण(दूध-दही-घी) खूब होती है संक्रांत महीने का पहला दिन होने वाला ठहरा पहाड़ गाँव के हिसाब से तो उसी दिन इस पर्व को मना देते हैं।

लोक संस्कृति की ये कुछ परम्पराएँ आज भी प्रचलित है पर चिंता इस बात की है कि ये सब अब धीरे धीरे कम होने लगा है। निम्न वर्ग द्वारा उच्च वर्ग को जो ओग(भेंट) देने की जो प्रथा थी अब वो समाप्ती की ओर है। मुझे आज भी याद है जब इस दिन गाँव में हमारे लोहार हमारे लिये सुई, चिमटा, अंगेठी, दराँती, कुदाल लेके आते थे भेंट के रूप में और घर वाले उन्हें उसके बदले अनाज और पैसा दिया करते थे। धन्य है हमारी संस्कृति धन्य यहाँ के लोग। जय देवभूमि उत्तराखंड।

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