Monday, April 1, 2013

अप्रैल फूल दिवस

दोस्तो आज यानि कि 1st अप्रैल है तो बहुत सारे देशों में ये दिन मूर्ख दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज उनके साथ हमारे देश में भी थोड़ा थोड़ा कर के इसे लोग मनाने लग गए हैं। लोग सुबह से ही लग जाते हैं एक दूसरे को FOOL (मूर्ख) बनाने में। वैसे इस April Fool को क्यूँ मनाया जाता है? इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है फिलहाल तो।

दोस्तो एक बार की बात है जब मैं कक्षा 4 मे पढ़ता था। यही आज का दिन था 1st अप्रैल यानि 'मूर्ख दिवस' । अब भई हमने भी सुना था कि आज तो किसी को भी ठगाया जाता है यानि मूर्ख बनाया जाता है, तो हम सोचने लगे क्या करें ....क्या करें ? किसे ' अप्रैल फूल ' बनाए ?

फिर दोस्तों ऐसा हुआ जो हमने खुद ही नहीं सोचा था, भई हमे तो कोई मिल ही नहीं रहा था, तो हमने पड़ोस में रहने वाले एक दादा जी को अपना निशाना बनाया अर्थात हमने सोच लिया कि दादा जी को ही क्यूँ न "अप्रैल फूल" बनाया जाये।

भई अब सोच लिया तो बनाने के लिए भी सोचने लगे कि कैसे बनाए.... वो दादा जी जरा 'कडुस' थे यानि बहुत ही खतरनाक टाइप के थे, हम लोग बहुत डरते थे उन से वो हमे कभी भी डराते रहते थे, वो हमेशा हमें बड़याठ (बड़ी दराँती) दिखा कर डराते थे। हमे बहुत डर लगता था उनके सामने जाने में।

अब हम सब सोचने लगे कि कैसे बनाया जाये उन्हे "मूर्ख" तो अंत में एक ख्याल तो आ ही गया। जैसा कि दोस्तो आप को तो मालूम ही है उस समय मोबाइल फोन तो थे नहीं, हमारे गाँव में तो लैंड लाइन फोन भी नहीं था। बस जिस का भी कोई संदेश आता जाता था, वो चिट्ठी के ही माध्यम से आते थे या तो किसी के जरिये आते थे।

तो हमनें उन दादा जी को "अप्रैल फूल" बनाने के लिए उन से ये कहा कि दादा जी आपको वो फलाने चाचा जी बुला रहे हैं, और बोल रहे हैं कि कुछ जरूरी काम है आपके बेटे का कोई संदेश आया है, और उन्होने कहा है कि जलधी से जलधी आयें। तो दादा जी ने हमारी बात मान ली और चले गए। हम तो बहुत खुश हो गए कि हमने उन्हें "मूर्ख" बना दिया, और मन ही मन डर भी रहे थे कि जब उन्हें पता चलेगा कि हमने झूठ बोला है तो फिर क्या होगा। जो भी हो उस समय तो हम लोग बहुत ही खुश थे।

अरे दोस्तो गज़ब हो गया सोचा हमने था उन्हे "अप्रैल फूल" बनाने का पर   बन हम खुद गए। वो कैसे ये बताता हूँ। हुआ यूं कि उन दादा जी को तो हमने झूठ मूठ मे उधर भेज दिया था, लेकिन जब वो उधर गए थे तो इत्फ़ाक से जो उधर चाचा जी थे उनके पास सच में कोई संदेश था।

उन चाचा जी ने दादा जी को ये बोला कि अरे आप आ गए मैं तो उधर ही आ ने वाला था , आपका फलाना 
संदेश आया है। दोस्तो फिर क्या जब दादा जी आए तो हमे उन्होने बोला साबास ऐसे ही काम किया करो, और उन्होने अंदर जा कर हमे 2-2 अखरोट दिये। बस दोस्तो सोचा कुछ था हो कुछ गया... हम खुद ही बन गए "April फूल" ।

बस दोस्तो यही था मेरा एक किस्सा इस "अप्रैल फूल" से जुड़ा हुआ। कैसा लगा आपको ये पोस्ट। कमेंट मे लिखना जरूर।

 

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