Thursday, April 11, 2013

दिल्ली मेट्रो का रोज(डेलि) का सफर


दोस्तों सोच रहा था कि क्या लिखूँ आप लोगों के लिये तभी एकदम से ख्याल आया क्यूँ न आज अपने देल्ही मेट्रो (Delhi Metro) के रोज के सफर के बारे में लिखूँ।

रोज सुबह 8:40 पे रूम से निकल जाता हूँ ऑफिस जाने के लिये फिर रूम से 10-15 मिनट वॉक करने के बाद उत्तम नगर वेस्ट मेट्रो स्टेशन पे पहुँच कर वही 8:55 या 9:00 पे वैसाली की ओर जाने वाली ट्रेन पे चडता हूँ क्यूंकी ऑफिस लक्ष्मी नगर में है न इसलिए।

जैसा कि दोस्तों आप में से लगभग सभी लोग जानते हैं कि मेट्रो में बहुत सारी शीट आरक्षित होती हैं, बुजुर्गो, विकलांगों और महिलाओं के लिये। ये अच्छी बात है हम सब को इस का ख्याल रखना चाहिए सबसे पहले।

जब भी मैं मेट्रो पे होता हूँ रोज कुछ ऐसे लोगों को देखता हूं जो आरक्षित शीटों पे बैठ जाते हैं और बिल्कुल आँखें बंद करके सोने की नौटंकी टाइप करने लगते हैं इस से वो सोचते हैं कि कोई आएगा तो वो उसे सोता देख कर शीट के लिये बोलेगा नहीं, मै अपने विचार से कह रहा हूं शायद वो यही सोचते होंगे। लेकिन ये अच्छी बात नहीं है, ये बहुत बुरी बात है कि हमे मालूम है कि वो शीट आरक्षित है फिर भी हम उस शीट का अपने लिये इस्तेमाल कर रहे हों।

वही आरक्षित शीट क्यूँ अगर हम किसी शीट पे बैठे हों और हमे कोई तकलीफ नहीं है तो उस समय अगर हमारे सामने कोई बुजुर्ग, या विकलांग खड़ा हो तो हमे वो शीट उसे दे देनी चाहिए, बिना बोले ही।

कई बार मैंने देखा है कि बहुत से ऐसे बुजुर्ग लोग होते हैं जो अपनी शीट छोड़ देते हैं अपने से ज्यादा बुजुर्ग व्यक्ति के लिये लेकिन बगल मे बैठा हुआ हटा-कटा व्यक्ति शीट नहीं छोड़ ता। ये कोई अच्छी बात है क्या नहीं ना दोस्तो ?

जहां तक मैं अपना जानता हूं अब तक तो मैं कभी भी आरक्षित शीट पे नहीं बैठा भले ही वो आरक्षित शीट खाली ही क्यूँ न हो, अब ऑफिस टाइमिंग पे तो भीड़ भी बहुत होती है तो शीट मिलना तो मुश्किल ही होता है फिर भी कभी भी अगर मेट्रो का सफर कर रहा होता हूं तो भी मैं कभी ऐसा नहीं करता। भले ही मैं पूरा सफर खड़े ही तय कर लूँ।

ये तो रही शीट की बातें एक बात और ध्यान में आई, अक्सर आप में से भी कई लोगों ने देखा होगा कि कई लोग ऐसे होते हैं जो बिल्कुल मेट्रो ट्रेन के गेट पर खड़े हो जाते हैं वो भी साइट में नहीं बल्कि बीच में, पता नहीं ये उन्हे क्या अच्छा लगता है। अरे कम से कम गेट तो खाली छोड़ देना चाहिए ना मानता हूं कि भीड़ काफी होती है जिस से अंदर जगह नहीं होती है...तो फिर भी ऐसे लोगों को कम से कम उतरने वाले को रास्ता तो देना ही चाहिए ना अगर वो गेट पे खड़ा है तो उसे बाहर हो जाना चाहिए थोड़ा उस समय जब लोगों को उतरना होता है। फिर तो वो चड़ ही सकता है ना, पर क्यूँ नहीं ऐसा सोचते हैं ये लोग।

मैं तो इस पोस्ट के माध्यम से यही कहना चाहता हूं कि ये चीजें थोड़ी समझ नी चाहिए हमें।

बाँकि दोस्तों कैसा लगा ये पोस्ट आपको ? आप लोग भी अपने कुछ विचार व्यक्त करे इसके बारे में, कमेंट्स के द्वारा।

ध्न्यवाद अपना बहुमूल्य समय देने के लिये।

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