Monday, May 22, 2017

भांग और भेकुवा'क ल्वात (रेशे)

दगड़ियों मजबूत टिकाऊ ज्योड (लंबी रस्सियाँ), गल्यां (पालतू जानवरों को बांधने की रस्सी) या किसी और छोटे मोटे चीज को बांधने के प्रयोग में आने वाली रस्सियों को बनाने के लिये हम पहाड़ी लोग अक्सर भांग, भेकुवा की लकड़ी, या बाभ्यो घास का ही प्रयोग करते थे, पर अब धीरे धीरे यह भी कम ही होने लगा है।

 इस आधुनिक जीवन में आज पलास्टिक की रस्सियाँ ज्यादा प्रचालन में आने लगी हैं हमारे गाँव घरों में भी अब। तो ल्वात वाले यह नजारे तो दुर्लभ ही हो गए हैं।

भांग या भेकुवा की सुखी लकड़ी से रस्सी बनाने के लिये इन्हें सबसे पहले कुछ दिनों तक पानी के तालाबों पर डुबाया जाता था गाड़ गधेरों के आसपास जिन्हें हम सीमार वाली जगह भी कहते थे, यह नहीं कि इस्तेमाल होने वाले पानी में बल्कि बेकार बहते हुये पानी के स्रोतों के आसपास इन्हें कुछ दिनों तक डुबोया जाता था और इनके ऊपर भारी पत्थर भी रख दिया जाता था जिससे कि ये हल्की लकड़ियाँ पानी के बहाव में बह ना जाएँ, जब यह पूरी तर गीली हो जाती थी तो इनसे वहीं जाकर ल्वात(रेसे) निकाल कर लाने वाले हुये, कुछ लोग तो लकड़ियाँ भी वापस ही लाते थे ताकि जलाने के काम आ जाएँ पर कुछ लोग छोड़ आया करते थे।


इन ल्वातों(रेशों) को लाकर फिर घाम(धूप) में सुखाने वाले ठहरे। जब ये सुख जाती थी इनको एक बोरे में रख दिया जाने वाला ठहरा और जब भी फुर्सत हो तो लंबी रस्सी या गल्यां बाटा जाता था किसी जानकार आदमी द्वारा।

ये रस्सियाँ काफी मजबूत होती हैं और तो और बिना रस्सी के भी इन ल्वातों(रेशों) से अक्सर कोई भी चीज बांधी जाती थी जहां पर जरूरत पड़े। तो आज का सलाम अपनी इस विलुप्त होती धरोहर के नाम।




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Friday, May 12, 2017

ओड़ ढुंग (पहाड़ गाँव में जमीन बँटवारे का चिह्न)

हमारे पहाड़ गाँव खासकर कुमाऊँ क्षेत्र में जब किसी भी परिवार में जमीन का बंटवारा होता है तो ओड़ डाला जाने वाला ठहरा जो वैसे तो एक ढुंग (पत्थर) होता है पर उसका मान सम्मान हर पक्ष को करना पड़ता है। घास के मैदान (मांग) हों या खेत हर जगह बँटवारे के वक़्त 'ओड़' से ही उन्हें अंकित किया जाने वाला हुआ।

एक और बात इस "ओड़" के लिये जब कभी हम बचपन में या अब भी खेतों में हल जोतते थे या हैं तो हम से बड़े हमारे बुजुर्ग यह कहते हैं कि ओड़ पर हल नहीं छूने देना, इसको तिराया जाता है इसका ध्यान रहे। इसकी एक वजह तो शायद यह है कि इससे ओड़ उखड़ने का डर रहता है और दूसरा यह कि इस ओड़ का एक तरह से बहुत सम्मान किया जाता है इसे दो पक्षों के बीच समझौता कराने वाला देवता तुल्य पक्ष माना जाता है।

मित्रों में जितना जानता था मैंने लिखने का प्रयास किया....आप लोगों से भी इस विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहूँगा। कृपया कर आप भी इसके बारे में कुछ बताएं....हो सकता है आपके उधर कुछ और कहा जाता हो इसे। हमें भी जानने को मिलेगा।

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