Thursday, March 15, 2018

सोशल मीडिया तक ही सीमित रह गये हैं हमारे लोकपर्व ! क्यूँ ?

phooldei festival uttarakhand fulari
कल हमारे पहाड़ गाँव का लोक पर्व "फूलदेई" था, सुबह से बहुत खुश और उत्साहित सा था मैं यह देखकर कि व्हाट्स'एप्प, फेसबूक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया से दोस्तों नाते रिशतेदारों के "फुलदेई" पर बधाई और शुभकामना संदेश आने लगे थे।

सोशल मीडिया पर इतना उत्साह पिछले कुछ सालों में से इस बार ज्यादा लगा।


कई मित्रों ने अपनी ओर से अच्छा प्रयास भी किया था जैसे कि एक पहाड़ी मित्र श्री विनोद गढ़िया जी ने सुंदर मनमोहक फुलदेई, वालपेपर और फ्रेम बनाया जो कि लगभग हर पहाड़ी के मोबाइल और सोशल मीडिया प्रोफाइल, पेज, ग्रुप में जरूर पहुंचा था किसी न किसी माध्यम से।
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टीम Pandvas की बनाई गई डॉक्यूमेंटरी भी बहुत चर्चित रही और तो और नेशनल टीवी समाचार NDTV ने भी उसे प्राइम शो में स्थान दिया। कई यूट्यूब चैनलों की विडियो भी शेयर हो रही थी फुलदेई पर बनी हुई। मतलब ये कि बाढ़ सी आ गई थी सोशल मीडिया पर 'फूलदेई' की।
शाम ढलते ढलते कई जगह से पता लगा कि घरों पर बच्चे ही नहीं आये "फूलदेई" मनाने। हल्द्वानी से एक मित्र लिखते हैं....हल्द्वानी में क्यूँ लोग फूलदेई नहीं मनाते? अल्मोड़ा से एक मित्र लिखते हैं इस बार एक भी बच्चा नहीं आया घर पर फूलदेई मनाने। और तो और गाँव से ईज़ा ने फोन में बताया कि छोटी बहन और मेरे छोटे भतीजे ने ही मोहल्ले में फूलचढ़ाये घरों की देहली पर जबकि मोहल्ले में और भी बच्चे हैं। ऐसा क्या हो रहा है कि अपने लोकसंस्कृति और अपनी परम्पराओं के लिये इतनी उदासिनता।

हम तो ऐसे नहीं थे, हमने तो अपने बचपन में अपने लोकपर्वों को बढ़ी ही उत्सुकता से मनाया है। फूलदेई के लिये क्या बाजार से 10 रुपए के फूल ला कर हम अपने घर की देली पर कुछ चाँवल के दानों के साथ नहीं चढ़ा सकते थे, अगर ऐसा करते हुये सोशल मीडिया में पोस्ट करते तो शायद औरों की उत्सुकता और बढ़ती।


ये किस ओर जा रहे हैं हम, हमारी लोकसंस्कृति हमारी, बोली भाषा हमारी असल पहचान अब केवल सोशल मीडिया तक ही सीमित होने जा रही है धीरे धीरे। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अपने बचपन को अपने बच्चों से शेयर करें उन्हें अपनी लोकपरम्पराओं के बारे में बताएं, ये कोई मैटर नि करता है कि हम कहाँ रहते हैं गाँव में या शहर में, पहाड़ में या परदेश में। पर क्या हम लोग जहां हैं वहीं अपनी लोकरीतियों को अपने बच्चों को नहीं बता सकते ? क्यूँ रह गये हैं हम पीछे....? क्यूँ भूल रहे हैं हम अपनी परम्पराओं को ? हम नहीं तो कौन है इसका जिम्मेदार ? क्या कल आने वाली पीढ़ी कोसेगी नहीं हमें जब उनको उनके लोकपर्वों, रीतिरिवाजों के बारे में कुछ पता ही नहीं होगा ?

बहुत चिंतनीय है.....कम से कम एक कोशिश तो कर ही सकते हैं जहां हैं वहीं जैसा हो सके वैसा अपनी परम्पराओं का मान रखें। बस छोटी सी कोशिश....मैं कर रहा हूँ, थोड़ी आप से आशा है....आज से अभी से।
धन्यवाद मैं Gopu Bisht एक पहाड़ी

Monday, March 5, 2018

कुछ ऐसा हुआ करता था हमारा वो दौर बोर्ड परीक्षाओं का


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आज से उत्तराखंड बोर्ड परीक्षा शुरू हो गई हैं, तो मन में कुछ यादें अपने दौर की आ गई ठहरी। आज से कुछ वर्षों पहले लगभग 2002-05 तक हाईस्कूल-इंटर की बोर्ड परीक्षा अपने गृह स्कूल में नहीं होने वाली ठहरी, परीक्षा सेंटर किसी और ही स्कूल में हुआ करता था। तो महाराज मेरे हमउम्र और मुझ से बड़े सभी को याद ही होगा ना कि किस तरह हम परीक्षा देने दूर सेंटरों में जाया करते थे, घर वाले 2-3 महीने पहले से ही रहने का ठौर ठिकाना ढूंढ लेते थे वहाँ, या तो किसी नजदीक के रिश्तेदार के वहाँ या दूर के रिश्तेदार के वहाँ या फिर किराए में। ज़्यादातर लोगों का ठिकाना रिश्तेदारी में ही होने वाला ठहरा। ग्रामीण इलाकों के सेंटर मुख्यतया बाजार वाले सेंटरों में हुआ करता था ! अब हम ठहरे ग्रामीण इलाकों के हाईस्कूल-इंटर कॉलेज में पढ़ने वाले तो...हमारा सेंटर था गंगोलीहाट जो हमारा मुख्य बाजार और तहशील ठहरा। मार्च में शुरू होने वाली परीक्षा अप्रैल मई तक भी चलने वाली हुई...पेपरों के बीच में 2 से 7-8 दिन का भी गैप हो जाने वाला हुआ कभी कभार। इसी बीच होली भी होने वाली हुई इन दिनों....तो होली की भी छुट्टी होने वाली ठहरी आगे पीछे।
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   इन दिनों बाज़ारों या गाँव घरों में रौनक सी आई रहने वाली ठहरी...जहां एक ही स्कूल के छात्र छात्रायेँ तो होते ही थे साथ ही अलग अलग स्कूलों के छात्र छात्राओं से भी मेल जोल हो जाने वाला हुआ, दोस्ती टाइप हो जाने वाली ठहरी या तो किराए पर रहने की वजह से या बाजार, गाँव घरों में रिशतेदारों में रहने की वजह से। अब जैसा कि हमारे पहाड़ गाँव में देखने को मिल ही जाता है बाजार हो या गाँव पानी के स्रोतों पर पानी लेने दूर दूर से पहुँचने वाले हुये....वहीं पर एक दूसरे से मिलन होने वाला हुआ, या फिर परीक्षा सेंटर पर परीक्षा हॉल में और आते जाते रास्तों पर।
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मैं भी अपने छोटे मामा लोगों के वहाँ पर था जब हाईस्कूल के पेपर थे मेरे। अब गंगोलीहाट में उस टाइम पे पानी की काफी समस्या थी कुछ एक जगहों पर हैंड पंप थे तो कुछ एक स्थानो पर वही प्राकृतिक जल स्रोत नौले धारे। हम लोग जान्धेवी के नौले से लाया करते थे वो भी सुबह 3:30 - 4 बजे। नौले धारों पर काफी भीड़ होने वाली ठहरी सुबह से शाम तक। किसी किसी के साथ परीक्षा के दिनों में उसके घर वाले आने वाले ठहरे खाना पीना बनाने के लिये तो कोई कोई दो चार लड़के या लड़कियां साथ में कमरा लेकर रहते थे तो काम भी बंट जाने वाला हुआ और कोई कोई खाना बाजार से खाने वाले हुये....बाँकी रिश्तेदारी वाले हुये हम जैसे जिन्हें बस अपनी परीक्षा में ही फोकस करना हुआ क्यूंकि बना बनाया सबकुछ मिल जाने वाला हुआ।
उसी समय वहीं नहा धोकर भी आने वाले हुये। क्यूंकी जैसे जैसे उजाला वैसे वैसे भीड़। हैंड पंप और
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पेपरों के दौरान चैत्र की अष्टमी भी आने वाली ठहरी जब गंगोलीहाट में कौतिक(मेला) लगने वाला ठहरा.....असली मेला ठहरा हो उन दिनों दिगौलाली। बाजार में काफी रौनक ठहरी उन दिनों। जब पेपरों में गैप होने वाला हुआ तो उस दिन पेपर देने के बाद घर को जाने की जल्दी होने वाली ठहरी छुट्टियों में। मेरे बाज्यू(पिताजी) मना करने वाले ठहरे घर आने को....कहते थे क्या है घर पढ़ाई करना वहीं, वहाँ खाना नहीं मिलता है क्या...? वगैरा वगैरा। फिर भी महाराज....5-6 दिन के गैप वाली छुट्टियों में तो चले ही जाने वाला हुआ घर, फिर भले ही थोड़ी डांठ ही क्यूँ न खानी पड़े॥

   बोर्ड पेपरों के दौरान काफी दोस्त बन जाने वाले हुये....नये नये, मोबाइल का तो उन दिनों चलन ठहरा ही नहीं मोबाईल फोन हमारे कॉलेज पहुँचने पर मिला ठहरा हमें इसलिये फिर कभी उनसे मुलाक़ात जैसे बाजार में, किसी गाँव में शादी में या कहीं और हुआ करती थी तो हाल चाल पुछने ही वाले ठहरे अच्छा लगने वाला हुआ।
परीक्षा समाप्ती के बाद अपने अपने घरों को लौट जाने वाले हुये, और फिर रिजल्ट का इंतजार करने वाले हुये। रिजल्ट जब आता था तो अखबार में लिस्ट आने वाली ठहरी....इन्टरनेट का हम जानने वाले ही नहीं ठहरे। 1.50रुपए वाला अखबार भी रिजल्ट के दिन 10 से 20 रूपये में खरीद कर लाये ठहरे बाबू। रिजल्ट कोई खास नहीं आया ठहरा फिर भी हाईस्कूल में पास हो गया करके बाज्यू बाजार से टॉफी, बिस्कुट, जलेबी लाये ठहरे और मोहल्ले में सबको बांटा ठहरा खुशी से।
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   ऐसा ही था हो हमारा वो दौर....बोर्ड परीक्षाओं का मीठा सा अच्छा सा....हसीन। आज तो बस हाय तौबा, कंपटीशन ही कंपटीशन। आज न खुशी है न चैन....पर तब था खुशी चैन और शकुन।
खैर सभी परीक्षार्थियों को पुनः भौत भौत शुभकामनायें।  

पोस्ट सर्वाधिकार सुरक्षित by Gopu Bisht

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