Saturday, February 23, 2013

गाँव में बने हुए लकड़ी के 'भरड़'

दोस्तों आप में से कितनो ने गाँव में घरो के आगे या अगल बगल बने हुए ये लकड़ी के 'भरड़' यानी तख्तो के बने हुए लेंटर जैसे देखे हुए हैं ! जिनका प्रयोग अनाज सुखाने या बैठने के लिए किया जाता था और किया जाता है ! 
भरड़

अब भी कुछ घरो में ये दिखने को मिलते है पर ज्यादा नहीं ! दोस्तो ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो अब समाप्ती की कगार में हैं। पर हाँ यादों में जरूर बसी रहेंगे। इनका ग्रामीण लोगों से काफी गहरा रिस्ता होता है।

ये किसी न किसी रूप में गाँव के लोगों की दिनचर्या का एक हिस्सा होती हैं। ऐसी पुरानी चीजों को देख कर सच मे बहुत ही अच्छा लगता है |  ये भरड़ काफी उपयोगी होते थे सर्दियों में इनमें बैठ कर धूप सेकने का आनंद लिया जाता था।

इनमें मोटे मोटे मजबूत लकड़ियों के तख्तों का प्रयोग होता था, जो लंबे समय तक टिकाऊ होता था। पहले तो गाँव में लगभग हर घर में ये देखने को मिलते थे, पर अब नहीं। अब अगर कहीं पर ये हैं भी तो केवल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में।

आप लोगों के गाँव में भी आप में से किसी को जानकारी है क्या इनके बारे में? कृपया करके अपने सुझाव और राय जरूर दें।
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Monday, February 18, 2013

मजेठी....पहाड़ी घरेलू मेहँदी


पहाड़ी घरेलू मेहँदी के रूप में जाना जाता है ये मजेठी का पौंधा।

फूल तो इसके बड़े ही प्यारे होते हैं, पर पत्तियाँ भी मेहँदी के तौर पर खूब प्रयोग में लायी जाती थी पहले।

दोस्तों आप में से किस किस ने इस पोंधे को देखा है? अगर इस पोंधे को देख कर किसी को कुछ याद आया तो बताइएगा जरुर। मुझे तो अपने बचपन के वो दिन याद आ गये जब हम लोग बचपन में खेल खेल में इस पोंधे की पत्तियों को तोड़ कर उन्हें पीस कर हाथो में लगा ते थे और कुछ ही देर में जब हाथ सुख जाते थे तब जब हम हाथो को धोते थे तो हाथ बिलकुल लाल हो जाते थे।

आप को पता है दोस्तों मेहँदी का काम करती हैं इस पोंधे की पत्तियां अगर किसी को यकीं ना हो तो घरो में पता कर सकते हैं। अब तो इस के पोंधे भी बहुत कम मिलते हैं | ये तो मेरे घर में लगा हुआ एक पोंधा है जिसे मैंने आप लोगो के साथ शेयर किया। एक बार आज मयियेगा जरुर।


Sunday, February 17, 2013

श्रीपंचमी

वैसे तो हिन्दू वर्ष के अनुसार माघ का यह महिना काफी पवित्र माना जाता है। माघ शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी, सरस्वती पंचमी और श्रीपंचमी भी कहते हैं। पर श्रीपंचमी का यह त्योहार उत्तरांचल के कुमाऊँ मण्डल में बड़े ही हर्षो-उल्लास के साथ मनाया जाता है। 


हमारे पहाड़ (उत्तरांचल) के विशेष कर कुमाऊँ क्षेत्र में इस दिन जौ की पत्तियाँ खेतो से लाकर देवी-देवताओं को चढ़ाते हैं तथा हरियाले की भाँति सिर पर रखते हैं। घर की महिलाएं हरेले की तरह ही अपने पति, बच्चों के सिर में जौं की पत्ती डालते हैं और लड़कियां अपने माँ-बाप, भाई बहन, और सगे संबंधियों के सिर में डालती हैं। हर घर में पकवान भी बनाये जाते हैं। बहू-बेटियाँ अपने माईके भी जाती हैं।लड़कियां इस दिन नाक-कान भी छिदवाती हैं। 




इस दिन से हमारे पहाड़ में होली की शुरुवात भी हो जाती है। कुमाऊँ क्षेत्र के ही कुछ हिस्सों में आज के दिन 'जौं की पत्ती' को गाय के गोबर के साथ टीका चन्दन कर के घर की देली(दहलीज) और खिड़कीयों पर लगाया जाता है। इसे जौं बाली या मौव बाली भी कहा जाता है। आप चित्र में देख सकते हैं।


आज से ही कुमाँऊ मण्डल में अलग अलग जगह 'बैठकी होली' गानी भी शुरू हो जाती है, जो खड़ी होली शुरू होने के दिन यानि कि इकाइशी अर्थात एकादशी के एक दिन पहले तक चलती है।

पूरे भारत वर्ष में हिन्दू सास्त्रों के अनुसार इस दिन विध्या की देवी माँ सरस्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन समय से इसे माँ सरस्वती के जन्मदिन के रूप में माना जाता है। बसंत ऋतु की शुरुवात हो जाती है इस दिन से और बसंत ऋतु के आते ही प्रकृति की सुंदरता और भी खिल जाती है। पेड़ों और फसलों पर फूलों की बहार आने लगती है। सरसों के खेतों में सुनहरी चमक फैल जाती है, रंग बिरंगी तितलियाँ और मधुमाखियाँ भिन भिनाने लगती हैं।

आप सभी को वसंत पंचमी, सरस्वती पंचमी और श्रीपंचमी की ढेर सारी शुभकामनायें। 

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"मेरे देश के माथे का सिरमौर हिमालय धाम है,
और बसा जिस राज्य में, उसका उत्तराँचल नाम है.

 

हाय दोस्तो !

मै गोपाल सिंह बिष्ट यानि गोपू आप लोगो को नमस्कार करता हूँ ! दोस्तो मेरा बहुत पहले से ही मन करता है अपनी देव भूमि की संस्क्रती को, इधर के रहन सहन को पूरी दुनिया में उजागर करू ! इसी प्रेरणा  के तहत आज में अपना एक ब्लॉग बनाने में सफल हुआ हूँ ! अपने इस ब्लॉग के माध्यम से मै हमेशा ये कोशीस करूँगा कि अपने पहाड़ की सभी प्रथाए, परम्पराए जो आज कही न कही हम लोगो की वजह से ही विलुप्त होने के कगार में हैं , उन्हें जीवित बनाये रखु !


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Hi guys!

I am Gopal Singh Bisht or Gopu greet you all. Friends I always thought that of our Devbhoomi culture, the living to do here exposed to the world. Under this motivation today have succeeded in creating a blog. Through this blog I'll always have this Koshis all of your mountain Prthaa, today announced traditions did not say we are at the brink of extinction because of the logo keep them alive!

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