Sunday, March 31, 2013

गंगावली क्षेत्र के मुख्य पर्यटन स्थल

यूं तो दोस्तो पूरा उत्तरांचल पर्यट्न के लिहाज से बहुत ही प्रसीद्ध है। फिर भी इसके पिथौरागढ़ (Pithoragarh) जिले को ही इसकी खूबसूरत वादियों के कारण छोटा कश्मीर भी कहा जाता है। जहां रामगंगा, सरयू, नरगूल एवं पातालगंगा बहती हैं। सरयू नदी और रामगंगा के बीच वाले सम्पूर्ण इलाके को संस्क्रत में गंगावली कहा गया है। गंगोली  इलाका भी इसे कहा जाता है।

यहाँ के पर्वत काफी ढलान लिये हुए हैं जल संचय की सम्भावनाऔं के कारण यहाँ की  भूमिं उपजाऊ है ।  इस गंगावली इलाके का  पर्यावरण सदा हरा भरा व सुरम्य रहता है। यहां की पहाड़ियां कुमांऊँ मडंल की अन्य पहाड़ियों से पक्की हैं। सड़कैं दूर दूर, पर बरसात  में कम बाधित रहती हैं।

चौकोड़ी
खेती-बाड़ी के लिहाज से भी ये क्षेत्र काफी अनुकूल है। यहां प्रायः सभी तरह की खेती की जाती है। फल फूल और सब्जियों  में इधर आम तौर पर (पहाड़ी नाम) केला, निम्बू, अखोड़, दाणिम, रीखू, नारिगं, आदो, काफल, किल्मोड़ो, बेडु हिसालू , बा`ज, बुरा`श, आम, अमरूद, तोरी, काकड़, आरू, और खुबानी होती हैं।

यहाँ का मुख्य पर्यटन स्थल चौकोड़ी है जहां कुमाऊँ मडंल विकास निगम के गेस्ट हाउस एवं प्राइवेट रिजार्टस् है, जो पर्यटको की सुख-सुभीधा को ध्यान मे रखकर  बनाए गए हैं।  इधर बेरीनाग और चौकोड़ी के चाय के बागान भी बहुत ही प्रसिद्ध हैं।

पाताल भुवनेश्वर

यहाँ पाताल भुवनेश्वर की गुफा  धार्मिक पर्यटन स्थलों में मुख्य है जो पिथौरागड़ जिले के गंगोलीहाट के करीब है। गंगोलीहाट एक तहसील है जो पिथौरागड़ जिले के पश्चमी भाग में स्थित है। पाताल भुवनेश्वर की गुफा इधर से लगभग 15-20 किलोमीटर उत्तर दिशा मे है।

इधर जाने के लिए गंगोलीहाट-बेरीनाग वाली सड़क के बीच में गुप्तड़ी नामक जगह पे सड़क कट जाती है।

महाकाली मन्दिर
गंगोलीहाट  मुख्य बाजार से कुछ ही दूरी पर देवदार के पेड़ो के झुरमुट के बीच में स्थित है-- महाकाली मन्दिर। यह मनोकामना पूर्ण करने वाली माता महिषासुर-मर्दिनी देवी की पीठ है। हर साल चैत्र माह की अष्टमी को यहाँ विसाल मेंला लगता है। यहाँ आप बड़े बड़े देवदार के पेड़ देख सकते हैं जो बहुत ही पुराने हैं। इन ही पेड़ो के बीच में बसा है ये काली माँ का मंदिर।

 गंगोलीहाट व बेरीनाग के बीच राँईआगर के पास कोटेश्वर महादेव का मंदिर है। यहाँ भी एक गुफा है जिसके भीतर शिव का मंदिर है।

भद्रकाली देवी
भद्रकाली देवी का मन्दिर सानिउडियार से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है इस मंदिर में भी हर बार  चैत्राष्टमी को भव्य मेंला लगता है। सानिउडियार वो जगह है जहां शान्डिल्य ऋषि ने तप किया था ये उनकी तपोभूंमि है।

कालीनाग मन्दिर पुगरांऊ- पट्टी की ऊंची चोटी पर स्थित है,  इस चोटी को कालीनाग डाना  भी कहा जाता है। दोस्तो आप विस्वास नहीं करोगे कि  भगवान श्रीकृष्ण के वरदान से आज भी इस चोटी के उपर गरुड़ पंछी नहीं उड़ते। हर साल सावन- भादो के महीने नागपंचमीं को इधर मेंला लगता है।

कोटगाड़ी देवी मन्दिर पुगरांऊ-पट्टी में  मदीगांव में स्थित है। कोटगाड़ी देवी अर्थात भगवती मैंया न्याय की देवी मानी जाती है, अन्याय के खिलाफ अन्तर्मन से कियी गयी पुकार की अवश्य ही सुनवाई होती है और गलती करने वाले को उसकी गलती का एहसास कराकर दण्ड दिया जाता है।

कोटगाड़ी देवी
हर बार यहाँ चैत्र और कार्तिक मास की  नवरात्रियों में  अष्टमी को विशाल मेंला लगता है।
धरमगर पांखू से उत्तर में मूलनागजी यानि मूलनारायण का भव्य शिखर मन्दिर है। जाड़ों में तीनों महीने यहां बर्फ गीरी रहती है। इतनी उंचाई के बावजूद यहां प्राचीन जलश्रोत है। जिसे विंवर(नौला) यानि धरती के भीतर नींचे को गुफा में जलाशय कहते हैं।

शिखर पहाडी  के उत्तरी घाटी में भनार श्री बंजैंण जी  का मन्दिर है और दश्रिण में सनगाड़ श्री नौलिंग जी  का मन्दिर है।  श्री नौलिंग जी  और श्री बंजैंण जी  मूलनारायण जी के पुत्र थे वो दोनों भाई बहुत प्रतापी थे। शिखर पहाडी  के दोनों तरफ इनके अलग अलग मन्दिर हैं। यहाँ के लोगों में इनके प्रति अगाध आस्था और वीस्वास है।  कार्तिक महीने की नवरात्रि में नवमी को सनगाड़- नौलिंग जी में मेंला लगता है जो पूरे कुमांऊ मण्डल  में बहुत  प्रसिद्ध है।

दोस्तो  इस पोस्ट में जीतने भी मैंने दर्शनीय स्थलो के बारे में बताया है, मैं उनकी जल्ध से जल्ध कम से कम एक एक फोटो जरूर लगाने की कोशिस करूंगा।

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Friday, March 29, 2013

दवनी और जातर

दोस्तो जैसा कि आप जानते ही होंगे पहले के समय में यानि कि आज से कम से कम 25-30 साल पहले गाँव घरों में ज़्यादातर संयुक्त परिवार होते थे। परिवार में ज्यादा सदस्य होते थे। और उस समय गाँव घरों में अनाज जैसे कि गेहूँ, चाँवल, मड़ुआ, मक्के को पीसने के लिए कोई इलेक्ट्रोनिक चक्की या डीजल वाली चक्की नहीं होती थी।

 उस समय लगभग सभी घरों में ये घरेलू चक्की यानि ‘जातर और दवनी’ होते थे। ये पत्थर के गोल चक्के होते थे। पत्थर के होने की वजह से ये काफी भारी भी होते थे। इसलिये इन्हें एक स्थान पर ही स्थापित कर दिया जाता था घर के किसी कोने में। अधिकतर सीडी के नीचे ये स्थापित किए जाते थे जिस से कि जगह का भी उपयोग हो जाये।

 जातर और दवनी ये दोनों दिखने में होते तो एक जैसे ही हैं लेकिन आकार में इनमें अंतर होता था। जातर बड़ा होता था और दवनी आकार में छोटा होता था।


 ‘जातर’ जो कि आकार में बड़ा होता था वो गेहूं, चाँवल, और मक्का को पीसने के लिए काम में लाया जाता था अर्थात आटा बनाने के लिए इसका उपयोग होता था। इसे एक साथ दो-दो लोग भी चलाते थे। जिस से एक-दूसरे की मदद के साथ-साथ जल्दी भी हो जाती थी। जैसे कि फोटो मे दिख रहा है ये गोल आकार के होते थे, इसके ऊपर वाले हिस्से में बीच में एक छेद होता है और एक किनारे पर एक हेंडल जो कि लकड़ी का होता है बना होता है। जिसे दो व्यक्ति आसानी से पकड़ कर घूमा सकते हैं। नीचे वाले हिस्से के बीच में एक छोटी सी लकड़ी का कील की तरह बना होता था। जो ऊपर वाले हिस्से को अपने साथ बनाए रखता था।

‘दवनी’ जो कि आकार में छोटा होता था वो दाल जैसे कि मसूर, भट्ट(सोयाबीन), मास(उड़द) आदि को पीसने के काम आता था। दवनी को कहीं भी ले जाया जा सकता था क्योंकि वो आकार में छोटा होने के कारण उतना भारी नहीं होता था। जैसा कि आप फोटो में देख ही रहे होंगे। आज भी गाँव घरों में ये देखने को मिलते हैं पर अब इनका उपयोग ज्यादा नहीं होता।

 ये हमारी कुछ खास धरोहरें हैं जिन्हें हमें सँजो के रखना चाहिये भले ही इनका उपयोग हम करें या ना करें । दोस्तो कैसा लगा मेरा ये पोस्ट आपको बताइयेगा जरूर ।

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Thursday, March 28, 2013

अँगूठा पकड़ना

दोस्तों हमारे पहाड़(उत्तरांचल) में एक रिवाज है अँगूठा पकड़ना। आप में से कई लोगों ने ये रश्म जरूर देखी होगी अपने पहाड़ में किसी की शादी में। उत्तरांचल (उत्तराखंड) के कुमाऊँ मण्डल में ये प्रथा प्रचलित है।

ब्या(शादी)के समय अँगूठा पकड़ने का ये काम वर यानि दूल्हे द्वारा किया जाता है। वर को ब्योली यानि दुल्हन का अँगूठा पकड़ना होता है। पता है दोस्तो जब कोई वर(दुल्हा) ब्योली(दुल्हन) का हाथ पकड़ता है तो उसे क्या बोलना होता है। अँगूठा पकड़ के वर(दूल्हे) को ब्योली(दुल्हन) से कहना होता है 'नहीं छोडूंगा', 'नहीं छोड़ूँगा', 'नहीं छोडूंगा'। कुछ समय के लिए वो वर ब्योली का अँगूठा पकड़े रहता है। 

जब ये रश्म होती है उस समय वर और ब्योली आमने सामने बैठे होते हैं। बहुत सारे लोग यानि वर पार्टी के सदस्य वर को हंसी मज़ाक में बोलते हैं, वर जी ज़ोर से पकड़ो छोडना मत।
अनोखी परम्पराए हैं हमारे पहाड़ की सच में । आधुनिकता की इस भाग दौड़ में ये प्रथाऐ भी धूमिल होती जा रही हैं। 

वो दिन कितने अच्छे होते थे जब टु-डे यानि दो दिन की बारात होती थी।पहले अक्सर टु-डे बारात ही की जाती थी लेकिन अब अधिकतर वन-डे यानि एक दिन की बारात ही ज्यादा होती हैं। चाहे वो दूर की हो या पास की।

वन-डे बारात में बहुत कम समय में ही अर्थात शोर्ट में बारात की रश्मे हो जाती है। जबकि टु-डे बारात में रात भर विस्तार से बारात की सभी रश्मे विस्तार पूर्वक निभाई जाती हैं।
दोस्तो मुझे बहुत अच्छा लगता है अपने पहाड़ की इन परम्पराओ को जानने में। अक्सर जब मैं गाँव जाता हूँ या गाँव मे होता हूं तो अपने बूढ़े-बुजुर्गों के साथ बैठ कर इन रीति रिवाजो को जानने की कोशीश करता हूँ।  

मैंने ऊपर जो ये फोटो लगाई है इस फोटो को देखा तो मेरे मन में ये ख्याल आया कि क्यूँ न मैं इस रिवाज के बारे में दो शब्द लिख दूँ। 

पता नहीं दोस्तो आपको मेरा ये पोस्ट कैसा लगा। मुझे आशा है कि आपको ये पसंद ही आया होगा। आप अपने विचारो को कमेंट्स के माध्यम से मेरे साथ सेयर कर सकते हैं। ये विडियो भी जरूर देखियेगा आपको अच्छी लगेगी। यह विडियो मेरी शादी की है। 



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