Wednesday, March 19, 2014

पहाड़ का 'फूलदेई या फूल संक्रांत' पर्व

दोस्तों जैसा कि हम सभी जानते हैं हिन्दी (कलेंडर) पंचांग के हिसाब से हिन्दी नववर्ष चैत्र महीने से माना जाता है। वहीं हमारे पहाड़ (उत्तराखंड) में चैत्र माह के पहले दिन अर्थात संक्रांत को 'फूलदेई या फूल संक्रांत' पर्व के रूप में मनाया जाता है।
phooldei-festival-of-uttarakhand-phooldeyi


इस दिन गाँव-घरों में बच्चे प्रात काल जल्दी उठने के बाद नहा-धोकर एक थाली और कटोरे में कुछ चाँवल, गुड़, मिश्री और इन दिनों होने वाले फूल(भिटोर, आड़ू, खुमानी, सरसों, प्योंली और बुरांस इतियादी के फूल) को रखकर अपने घर की देली (दहलीज/दरवाजे का चौखट) से शुरुवात कर के मोहल्ले के सभी घरों में जा कर देली की पुजा करते हैं अर्थात चाँवल और फूल चड़ाते हैं।

हर घर का एक सदस्य उनका इंतजार कर रहा होता है, वो सदस्य बच्चों की थाली में जो जो चीजें होती हैं उसी के समान उनकी थाली में चाँवल, गुड़, मिश्री, और पैसे अपने घर से भी देते हैं।

वो बच्चे अपनी पहाड़ी भाषा में कुछ पंक्तियाँ भी गुन गुनाते हैं:-
phooldeyi-फूलदेई या फूल संक्रांत"फूल देई छ्म्मा देई,
भाई जी को बैणा जी को।
लाख बरस की उम्र देई,
जतुके देई उतुकै सही।
देई द्वार भर भकार,
सास ब्वारी एक लकार।
फूल देई छ्म्मा देई,
यो देई हीं बारंबार नमस्कार।
फूल देई छ्म्मा देई,
जतुके देई उतुकै सही।"

बच्चे फिर सारा सामान इकट्ठा कर के अपने अपने घरों में ले जाते हैं और शाम को फिर उन चीजों का कोई पकवान बनाते हैं, जैसे चाँवल को पीस कर उसमें गुड़ या मिश्री मिला कर उसकी 'साई' (चाँवल का हलवा) बनाते हैं, फिर आस पड़ोस में भी बांटते हैं।

इस तरह से मनाया जाता है, ये फूलदेई का पर्व हमारे पूरे पहाड़ में। मैंने अपने गाँव में बड़े होते हुये जो देखा सुना वो आपके सामने प्रस्तुत किया। होता तो यही है पर हो सकता है कि इस रिवाज को मनाने का ढंग अलग अलग जगह पर अलग अलग हो।

अब धीरे धीरे इन परम्पराओं का प्रचलन कम होता जा रहा है। आधुनिकता की इस दौड़ में ये चीजें धीरे धीरे पीछे छूट रही हैं, आजकल के बच्चों का रुझान भी कम होता जा रहा है इन चीजों से।

इसके जिम्मेदार भी कहीं न कहीं हम ही हैं क्यूंकी अब बच्चों को वो पहले का जैसा ना तो माहौल मिलता है ना इन परम्पराओं के बारे में ज्ञान। इन सबकी वजह है अपने पहाड़ से होता हुआ पलायन।

लेकिन मेरा मानना तो यही है कि हमें इन परम्पराओं को जीवित रखने का प्रयास तो करना ही चाहिये, इनके बारे में अपने बच्चों को जानकारी दे कर।

फुलदेई त्यार पर बनी एक कुमाऊँनी हिन्दी कविता



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Friday, March 14, 2014

ब्रज मण्डल देश देखो रसिया.... मेरे गाँव की एक और होली !

दोस्तों भगवान कृष्ण के ब्रज मण्डल को समर्पित एक खड़ी होली गीत, जिसमें बृज के बारे में थोड़ा बहुत उल्लेख किया गया है।

हमारे गाँव में गाये जाने वाली होली गीत में से ये भी एक है। जितनी मुझे याद है आप लोगों के समक्ष रखने की कोशिस कर रहा हूँ। भूल चूक गलती माफ करना।

'ब्रज मण्डल देश देखो रसिया'

ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
हे ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
तेरे ब्रज में गाय बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में गाय बहुत हैं।
तेरे ब्रज में गाय बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में गाय बहुत हैं।
छोटे छोटे गाय बड़े बछिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
हाँ छोटे छोटे गाय बड़े बछिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
हे ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
तेरे ब्रज में मोर बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में मोर बहुत हैं।
तेरे ब्रज में मोर बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में मोर बहुत हैं।
नाचे मोर देखे रसिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
हाँ नाचे मोर देखे रसिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
होली भे होली भे.....होली भे।
ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
हे ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
तेरे ब्रज में धान बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में धान बहुत हैं।
तेरे ब्रज में धान बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में धान बहुत हैं।
कुटे नारी फटे रसिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
हाँ कुटे नारी फटे रसिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
हे ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
होली भे...होली भे.....होली भे।
होली भे....होली भे.....होली भे।    |! समाप्त !|

धन्यवाद ! अपने सुझाव जरूर दें कमेंट कर के।

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Tuesday, March 11, 2014

मोस्ट या महट

दोस्तों आज इस मोस्ट (बांस या निगाल की बनी हुई एक प्रकार की चटाई) के बारे में कुछ बात करते हैं। जो शायद गाँव की उन पुरानी यादों को फिर से ताजा कर दें।

हमारे पहाड़ के गाँवों में पुराने समय में इन मोस्टों का उपयोग अनाज को धूप में सुखाने के लिये किया जाता था। आज से कुछ साल पहले तक गाँव के अधिकतर घरों में इनका इस्तेमाल किया जाता था।
कुछ जगह पे तो आज भी हैं ये पर केवल विलुप्त होती अवस्था में। क्यूंकि अब ना ही गाँवों में लोग उतनी खेती करते हैं और अगर कहीं पर होती भी है तो इन मोस्टों की जगह प्लास्टिक या कपड़ों के बनी हुई चटाईयों या तिरपाल (मोटे मजबूत कपड़े की दरी) ने ले ली है।
मोस्ट या महट
मोस्ट या महट

इन मोस्टों को कहीं-कहीं पे महट भी कहा जाता है, शायद और भी कुछ नाम हो सकते हैं इसके अलग अलग गाँवों में। ये चौकोर होते थे इन्हें फ़ोल्ड करने के लिये दो लोगों की जरूरत पढ़ती थी इसके दो सिरों पर से दो लोग इसे फ़ोल्ड करना एक साथ शुरू करते थे ताकी यह एक बेलनकार आकृति में फ़ोल्ड हो जाय। फ़ोल्ड करने के बाद इसे बांधने के लिये इसी पर बीच में एक घास की या कोई भी रस्सी होती थी जिस से इसे बांधा जाता था। फिर इसे अंदर भाड़ (छत से थोड़ा नीचे और कमरे के ऊपर बना हुआ एक लकड़ियों से बनी हुई रैक) में या कहीं पर घर के किसी कोने में रख दिया जाता था।

गाँव में घर में आग में ज्यादा खाना बनाने की वजह से धुवां होने से कालिख भी ज्यादा ही होती थी जिसे 'झाला" कहते हैं, उसकी वजह से घर में रखा हुआ अधिकतर समान का रंग भी काला ही हो जाता था। पर अब गाँवों में भी गैस-सिलेन्डर पहुँच ने लगे हैं जिस से आग में खाना बनाना भी कम हो रहा है धीरे धीरे।
उसी की वजह से चित्र में आपको इस मोस्ट का रंग भी काला सा लगेगा।

दोस्तों हमारे पूर्वजों ने ये चीजें बनाई थी प्रकृति की मदद से अपने हाथों से अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये। ऐसी बहुत सी चीजों का उन्होने निर्माण किया था उन लोगों ने केवल प्राकृतिक संपदा(पेड़, पौंधे, घास, पत्थर) की सहायता से। जो काफी मजबूत और टिकाऊ होते थे।
अब हम समय के साथ इतना आगे निकल गए हैं कि इनका उपयोग तो हम कर नहीं पा रहे हैं और हम शायद इनकी जरूरत भी महसूस नहीं होती, पर इतना जरूर हैं कि ये हमारे लिये हमारी धरोहरों के रूप में हैं ऐसा कहना गलत नहीं होगा।

ये मेरी बस एक छोटी सी कोशिस है इन अपनी धरोहरों अपने पूर्वजों की अमानत को अपनी यादों में हमेशा के लिये जीवित रखने की।

हम लोगों में से शायद किसी ने इन्हें नहीं भी देखा होगा, शायद किसी के गाँव में इंनका इस्तेमाल नहीं भी होता होगा, हो सकता है किसी अलग जगह पर इसे अलग नाम से जाना जाता होगा कुछ भी हो सकता है पर दोस्तो मेरी आप से एक विनती है कि आप अगर कुछ भी इस के बारे में जानते हैं तो अपने विचार जरूर व्यक्त करें।

इस बार अगस्त 2014 में हमारे एक फेस्बूक मित्र 'हरेन्द्र वर्मा जी' के द्वारा बागेस्वर के कपकोट मेले से ली गयी 'महट या मोस्ट' की एक ताजा तस्वीर प्राप्त हुयी। जानकर बहुत अच्छा लगा कि अब भी कुछ जगहों पर ये इस्तेमाल की जाती हैं।
मोस्ट या महट
महट या मोस्ट की एक ताजा तस्वीर


दोस्तों आप में से शायद कई लोगों को अजीब भी लगता होगा और कई लोगों को शायद अच्छा भी पर क्या करूँ खाली वक्त पर बैठ कर मुझे यही ऐसे ही कुछ ना कुछ लिखना अच्छा लगता है।

धन्यवाद ! पर अपनी राय और सुझाव जरूर दें !

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Monday, March 3, 2014

पाठी, दवात और लकड़ी की कलम

दोस्तों आज से लगभग 30 साल पहले [कहीं कहीं तो अभी भी] हमारे पहाड़ के गाँवों में प्राइमेरी स्तर तक पढ़ने-लिखने के लिये उतने खास साधन नहीं हुआ करते थे लोग दूर दूर तक मिलों पैदल चल कर स्कूल जाया करते थे।
paathi-dawat-lakdi ki kalam

पाठी में लिखता हुवा बच्चा 
पढ़ने लिखने के लिये प्राइमेरी स्तर तक के बच्चे कापी किताब की जगह तख्ते की बनी हुई एक आयतकर तख्ती का इस्तेमाल करते थे, जिसे काले रंग से पोत दिया जाता था।

काले रंग के लिये टॉर्च के सेल का प्रयोग या कोयले का प्रयोग करते थे। इस तख्ती को गाँव में "पाठी" कहते थे। इसमें दोनों ओर से एक धागा बंधा होता था जो कंधे में या पीठ में लटकाने के लिये बना होता था।

इस पाठी में लिखने के लिये जिस स्याही का प्रयोग होता था उसे खड़िया (सफ़ेद पत्थर या मिट्टी) से बनाया जाता था। इसे एक छोटे से प्लास्टिक या टीन के बर्तन जिन्हें दवात कहा जाता था, में पानी ढाल कर भीगा दिया जाता था।

इस दवात पर भी एक धागा बांध दिया जाता था हाथ में पकड़ने के लिये।
 
पाठी में लिखने के लिये एक लकड़ी की कलम बनाई जाती थी, जिसे दवात में डुबो डुबो कर लिखा जाता था। उसे दवात में ही रखा जाता था। ऐसे थे वो दिन वो वक़्त जो आज कितना बदल चुका है।

पहले तो हर घर में ये मिल जाते थे पर अब बहुत से पुराने घरों में ही आज भी रखे हुये हैं ये 'पाठी-दवात' एक याद के रूप में।

मेरे कई मित्रों द्वारा मुझे ये बताया गया है  कि आज भी कुछ जगहों पर प्राइमेरी में पढ़ने वाले छोटे बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिये इस्तेमाल हो रही हैं। हमने भी प्राइमेरी में पहली कक्षा तक इसी में पढ़ा था।

दोस्तों इस पोस्ट को लिखने का मेरा यही एक मात्र उद्देस्य है कि वो दिन और वो हमारी सांस्कृति विरासतें तो हमारे जेहन में अभी भी मौजूद हैं पर इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में वो थोड़ा थोड़ा कर के पीछे छूटते जा रहे हैं।
ये बहुत जरूरी है कि हमें इस समय के साथ कदम से कदम मिलना है, आगे बढ़ना है पर इसके लिये हम अपने वो सुनहरे पल भूल तो नहीं सकते ना। कल को आने वाली हमारी अगली पीड़ी को कम से कम ये तो पता होना चाहिये कि एक वो समय था जब ऐसा होता था। इसलिये मेरे मन में ये ख्याल आया क्यूँ ना थोड़ा सा वक़्त उन यादों को सँजोने में लगाऊँ।

मुझे पूरी आशा है कि आप लोगों को यह पोस्ट जरूर अच्छा लगेगा, ये जरूर आपके दिलों को छुवे का क्यूंकी कहीं न कहीं आपका भी इससे लगाव है।

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