Monday, October 20, 2014

मेरे गाँव (पहाड़) का 'दुतिया त्यार' या 'भैया दूज' पर्व !

हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की दुतिया/द्वितीया तिथि को होने वाले भैया दूज पर्व को मेरे गाँव (पहाड़) में 'दुतिया त्यार (पर्व)' के नाम से भी जाना जाता है। जैसा की हम सब जानते हैं यह पर्व भाई-बहन के प्यार के अट्टूट रिश्ते को समर्पित है।

हमारा पहाड़(उत्तरांचल) यूं तो अपनी लोक संस्कृति के लिये काफी प्रसिद्ध है। कई तरह के त्योहार मनाये जाते हैं हमारे पहाड़ में उनमे से ही एक है यह "दुतिया पर्व"। हमारे पहाड़ के गाँवों में इन त्योहारों का बड़ा ही महत्व है। और इन्हें मनाया भी पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ है। इस पर्व को मनाने की रश्म भी हर जगह अलग अलग है। आज में आपको अपने गाँव में इस 'दुतिया पर्व' को मनाने के बिषय में जानकारी दूंगा।

इस दुतिया पर्व के लिये हमारे गाँव घरों में कई दिन पहले से ही तैयारी होने लगती है। वैसे तो असौज-कार्तिक का यह महिना गाँव में काफी काम काज के लिये माना जाता है क्यूंकि इन्हीं महीनों में फसल एवं घास कटाई का अत्यधिक काम होता है। फिर भी 'त्यार' तो त्यार ही होता है उसके लिये किसी प्रकार की कमी नहीं की जाती है।

धान के च्युड़ेहमारे यहाँ इस दुतिया पर्व के लिये 'धान के च्युड़े' बनाये जाते हैं। गाँव में कुछ लोग तो दुतिया से 7-8 दिन पहले ही इन च्युड़ों को बना लेते हैं और कुछ दुतिया के पहले दिन ही बनाते हैं। इन्हें बनाने के लिये 2 दिन पहले धान(चाँवल के बीज) को एक बर्तन में (अधिकांस रूप से लकड़ी की छोटी डलिया, या टीन की बड़ी छलनी) भीगा दिया जाता है। उसके बाद तीसरे दिन सुबह-सबेरे या शाम के समय इन धान को कुटा जाता है। इन च्युड़ा के धान को कुटा भी एक अलग तरीके से है।

सबसे पहले तो ओखली के नजदीक में ही आग की अंगेठी या चूल्हा लगाया जाता है फिर उसमें एक लोहे की पुरानी कढ़ाई रखी जाती है। उसके बाद कढ़ाई गर्म होने पर उसमें छोटी सी मात्रा में घी या मक्खन डाला जाता है। फिर थोड़े से धान डाले जाते हैं ओखली में कुटने के हिसाब से, उन्हे कुछ देर तक भुना जाता है जब वो थोड़े से सुनहरे हो जाते हैं तो उन्हें ओखली में डालकर कुटा जाता है। इसी तरह से सारे भिगाये हुये धानों को कुटा जाता है।  इन्हें कूटते समय एक ये बात भी प्रचलित है कि जो सातवीं बार और आठवीं बार कुटा जाता है उन्हें लड़के और लड़कियों में बांटा जाता है। सातवीं बार वाला हिस्सा लड़कियों का और आठवीं बार वाला हिस्सा लड़कों को दिया जाता है। जो उसी समय खा सकते हैं बाँकि दुतिया पर्व के ही बाद च्युड़ा को खा सकते हैं उस से पहले नहीं।

ये तो थी 'दुतिया पर्व' का विशेष च्युड़ा बनाने संबंधी जानकारी। अब दुतिया पर्व को हमारे गाँव में किस तरह से मनाया जाता है वो जानिए।

दुतिया के दिन सुबह नहा-धोकर सबसे पहले घर की लिपाई पोताई की जाती है फिर घर के मंदिर में पूजा की जाती है और जो च्युड़ा बनाये होते हैं उन्हें भगवान को चड़ाये जाते हैं और साथ ही एक कटोरे में तोड़ा तेल और उसमें दुब घास भी रखी जाती है। उसके बाद घर की महिलाएं अपने पति-बच्चों और अन्य लोगों के सिर में च्युड़ा डालती हैं बिल्कुल हरेले की तरह लेकिन उस से पहले कटोरे में रखे हुये तेल को दुब घास से पैरों में-फिर घुटने पर-फिर कंधे पर- और फिर सर पर छुवाया जाता है। इसी तरह से घर की लड़कियां अपने माँ-बाप और भाई-बहनों और परिवार के अन्य सदस्यों के सर ये च्युड़ा डालती हैं।

घर में तरह-तरह के पकवान भी बनाये जाते हैं जैसे- पूरी, कचौड़ी(बेड़ी लगड़), खीर, पुवे इत्यादि। ये सब करने के बाद अधिकांस विवाहित महिलाएं अपने माईके को जाती हैं, अपने भाई के सर च्युड़ा डालने।

फून-fun
और इन सभी के साथ-साथ इस दिन हमारे गाँव(पहाड़) में बैलों और बछड़ों को भी पूजा जाता है। इसके लिये बैलों के सिर-सिंघ और जुड़े पर तेल लगाया जाता है, फिर उन पर अछ्त-पीठा (टीका) लगाया जाता है। उसके बाद उनके सिर पर रामबांस के रेस्सों से या भांग की डोरियों से बनाया हुआ फूल की तरह का एक-एक "फून" बांधा जाता है जैसा चित्र में दिखाया गया है। बैलों की पीठ पर नाली या माड़ (लकड़ी का बना हुआ अनाज मापने वाला एक बर्तन) से भिगोये हुये सफ़ेद खड़िया से गोल गोल आकृति भी बनाई जाती है जिसे धापना कहते हैं। फिर उन्हें भी एक-दो पूरी और पुवे खिलाये जाते हैं।

गाँव में बने मंदिरों में भी जाकर च्युड़े चड़ाए जाते हैं। तो दोस्तो इस तरह से होता है यह पावन "दुतिया पर्व" मेरे गाँव में। शायद आप के गाँव में भी इसी तरह से होता होगा या थोड़ा बहुत अलग। यही हमारी लोक परम्पराएँ हैं जिन से हम जुड़े हुये हैं....पर आधुनिकता की इस भाग-दौड़ में अब ये धीरे धीरे कम होती जा रही हैं।

मुझे पूर्ण आशा है की आपको मेरा यह ब्लॉग जरूर पसंद आया होगा। बस यह मेरा एक छोटा सा प्रयास है अपनी लोक परम्पराओं को जीवित रखने का। आप भी अपने विचार मेरे साथ जरूर सेयर करें। मुझे भी खुशी होगी।

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Thursday, October 9, 2014

'स्वांल या स्वाल पथाई' कुमाऊँ की एक अनूठी रश्म !

'स्वांल पथाई' कुमाऊँ की एक अनूठी रश्म है! यह रश्म उत्तराखंड के कुमाऊँ मण्डल क्षेत्र के अधिकांस हिस्सों में प्रचलित है। यह रश्म जनेऊ संस्कार और शादी में आयोजित की जाती है।

स्वांल या स्वाल पथाई
पहले के समय में या कहीं कहीं अब भी जब किसी का द्वि दिवसीय जनेऊ संस्कार पुरानी रीति रिवाजों के आधार पर किया जाता था या किया जाता है उस अवसर पर प्रथम दिन यानि की 'ग्रहजाग' वाले दिन स्वांल पथाई की यह रश्म निभाई जाती थी या है। पर अब अधिकांस जगहों पर इन पुराने रीति रिवाजों के आधार पर जनेऊ संस्कार बहुत कम देखने को मिलता है इसलिये स्वांल पथाई की यह रश्म भी अब केवल शादीयों के अवसर पर ही देखने को मिलती है।

इस रश्म में घर और गाँव की महिलाओं द्वारा सर्वप्रथम आटे को गूँथ कर उस से गणेश जी की प्रतिमा और स्वस्तिक बनाया जाता है और फिर पुरियाँ बेली जाती हैं जो कुछ समय बाद पकाई जाती हैं जिन्हें "स्वांल" कहा जाता है। ये स्वांल और पुरियों से थोड़ा सक्त होती हैं।

शादी के अवसर पर यह रश्म दुल्हा और दुल्हन दोनों के वहाँ होती है। शादी के पहले दिन इस रश्म का आयोजन किया जाता है। जिसमें गाँव की महिलाएं और घर की महिलाएं हिस्सा लेती हैं। स्वांल को पकाने के बाद हल्वे(आटे का) के साथ पूरे गाँव में बांटा जाता है।

हमारे पहाड़ की ये लोक परम्पराएँ हमारी असली पहचान हैं।

दोस्तों 'स्वांल पथाई' के बारे में जितना मैंने देखा और सुना है उतना आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर दिया है....आप भी अगर कुछ इस से अधिक इस खुबसूरत रिवाज के बारे में जानते हैं तो कृपया हमारे साथ जरूर सेयर करें।

'स्वांल पथाई' कुमाऊँनी शादी की एक अनूठी रश्म पूरी विडियो




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Monday, September 15, 2014

ऐसा होता है मेरे गाँव का 'खतड़वा' पर्व

Khatarwa 'खतड़वा' पर्व उत्तराखंड के कुमाऊँ मण्डल में विशेष रूप से घर के पालतू जानवरों (गाय, भैंस, बैल, बकरी आदि) को होने वाले रोगों से सुरक्षित रखने की कामना हेतु मनाया जाने वाला पर्व है। इस दिन जानवरों के गोठ(रहने की जगह) की सुबह से ही साफ-सफाई की जाती है जानवरों को भी नहलाया धुलाया जाता है, उनके सामने हरी हरी घास डाली जाती है...।

'खतड़वा' पर्व1
दोपहर के बाद घरों के कुछ सदस्य(विशेष रूप से बच्चे) एक स्थान पर जाते हैं जो पहले से ही निश्चित होता है, जहां पर वो पहले तो अपने अपने घर के पालतू जानवरों के रहने के स्थान सा छोटा सा डिज़ाइन बनाते हैं...छोटे छोटे पत्थरों, लकड़ियों और रामबांस के कोमल कोमल पत्तों से फिर उसके अंदर पत्थर के छोटे छोटे जानवर रखते हैं और फिर उनके अंदर हरी हरी घास भी फैकी जाती है।
'खतड़वा' पर्व-2जब सभी लोगों के इस तरह के घर बन जाते हैं तो फिर सब लोग इकट्ठा हो कर पास में ही एक जगह पर लकड़ी, सुखी घास और सुखी झड़ियों को इकट्ठा करते हैं, जिस से एक विशाल पुतले का रूप दिया जाता है।

उसके बाद शाम को जब अंधेरा होने लगता है तब पूरे गाँव के हर घर से एक सदस्य अपने घर पर 2-3 भांग के डंडे पर एक एक कद्दू का फूल और एक एक छोटी सी बिच्छू घास बांध कर उन्हें क्रमश एक घर की छत पर, एक जानवरों के गोठ में और एक घर के पास में जहां पर जानवरों का गोबर इकट्ठा होता है वहाँ पर रखते हैं।
'खतड़वा' पर्व-3

फिर घर से एक मशाल जिसे पहाड़ी भाषा में "रांख" कहते है वो बना कर और उस पर भांग के डंडे पर एक छोटी सी बिच्छू घास एवं कद्दू का एक फूल बांध कर, उस मशाल को सर्वप्रथम अपने घर के गोठ(पालतू जानवरों के निवास) में जानवरों के ऊपर से नजर उतार कर, साथ में एक-एक दो दो हरी ककड़ी और नमक ले कर उस पुतले वाले स्थान पर पहुँचते हैं।

फिर पहले तो जो वहाँ पर बच्चों द्वारा छोटे छोटे घर बनाए होते हैं( जैसा ऊपर चित्र में दिया है) उन पर भी मशाल से नजर उतारी जाती है। उसके बाद जब सब लोग आ जाते हैं कहीं कहीं तो सभी लोग कुछ लोग गीत गाते हुये उस पुतले के चक्कर लगते हैं और धीरे धीरे सभी लोग अपनी अपनी मशाल से उस पर आग लगा देते हैं और उस पर ककड़ी के टुकड़े चड़ा देते हैं और सभी लोग आपस में भी ककड़ी को बांटते हैं फिर उस स्थान से जली हुयी लकड़ी के कुछ टुकड़े ला कर गोठ में रख देते हैं। और साथ में सभी घर के सदस्यों को प्रसाद स्वरूप ककड़ी बांटते हैं।
'खतड़वा' पर्व-4

दोस्तों ऐसा होता है मेरे गाँव में 'खतड़वा' पर्व जो हर साल अश्विन माह के प्रथम दिन अर्थात संक्रांत को मनाया जाता है। क्या आपके गाँव में भी इसी तरह से होता है बताएं।

जैसा कि हम सब जानते हैं Khatarwa (खतड़वा) के विषय में कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा समाज में एक गलत धारणा को जन्म दिया गया है। जिसके बावजूद राज्य सरकार(उत्तराखंड) द्वारा इस पर रोक लगा दी गयी है। पर जहां पर अच्छी सोच है वहाँ आज भी लोग इसे मानते हैं।

धन्यवाद। अपनी राय जरूर दें।

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Wednesday, July 2, 2014

पलायन अर्थात पहाड़ का कुष्ठरोग !

प्यारे मित्रों पलायन अर्थात पहाड़ का कुष्ठरोग, आज पहाड़ के लिए नया नहीं है ।

प्राचीन काल में भी पहाड़ के लोग काम की तलाश में दूर दराज, और मैदानी क्षेत्रो में जाया करते थे । कुछ समयावधि के पश्चात पुनः पहाड़ लौट आया करते थे । उनके द्वारा अर्जित धन से पहाड़ की सम्म्पन्न्ता निरंतर बढ़ रही थी ।

परन्तु आज जो भी सैलपुत्र पहाड़ से पलायन करता है पुनः पहाड़ की ओर लौटकर नहीं आता । फलस्वरूप आज की नयी पीढी अपनी भाषा से भी अपरिचित हो गयी है ।

स्वजनों आओ जानते हैं आज कुछ देवभूमि के पहाडो ,मैदानों ,खेतों ,झरनों ,घरों के आस पास को किस नाम से जाना जाता है ।


पहाड़ी बोली के कुछ शब्द हिन्दी अर्थ के साथ !

तलाउ- सिचाई वाली जमीन
स्यर- दलदल
उप्राऊ-बिना सिंचाई के जमीन
तपड-समतल जमीन
उखड-बंजर जमीन
बाड -सब्जी उगाने वाला खेत
गैर- घाटी
कमिन-कमाया हुआ खेत
तैल-जहा सूर्य की सीधी रौशनी पड़ती है
स्यौ-जहां सूर्य की रौशनी नहीं पहुचती
तल्ला -निचला
मल्ला-ऊपर
बगड़-नदी किनारे की जमीन
धार-पहाड़ की पीठ, खड़ी चड़ाई
छिड़ -जलप्रपात
घट- पनचक्की
कराव- पहाड़ की ढालू जमीन
डाना-ऊंचे पहाड़
गूल-छोटी नहर
बीसी- एक एकड जमीन
रौ -नदी का गहरा हिस्सा
ताल-तालाब
बाखली-घरों का समूह
नाली-आनाज का तौल
खाव-छोटा जलकुंड
गधेरा-छोटी बरसाती नाला
रौल-छोटी नदी
गाड़-नदी
ग्वाल - गाय बैलों के साथ जंगल जाना
छिन- पहाड़ी पे एक ऊंचा चौड़ा स्थान
संजायत-जो बस्तु बंटी न हो
पार- उस साइट
वार- इस साइट
यां- इधर
वां- उधर
भीड़- दीवाल
तिरौड - किनारा
ओड़- बँटवारे का निशान
पाख- घर की छत
देली- घर की दहलीज
उखौव- ओखली
छाज- खिड़की
द्वार- दरवाज़
मोव- मकान, मकान के आगे का हिस्सा
हौव- हल
बल्द- बैले
नान- छोटा
ठूल-बड़ा ........इत्यादि !

दोस्तों ये पूरा लेख मेरा नहीं है इस लेख की कुछ पंक्तियाँ मैंने मेरे एक फेस्बूक मित्र "श्री बाला दत्त बेलवाल" जी की प्रोफ़ाइल से लिया है।

दोस्तों पहाड़ से भले ही दूर चले जाओ पर पहाड़ की भाषा- संस्कृति से कभी दूर मत जाना। हमेशा अपने पहाड़ से रिश्ता बनाए रखना।

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Wednesday, March 19, 2014

पहाड़ का 'फूलदेई या फूल संक्रांत' पर्व

दोस्तों जैसा कि हम सभी जानते हैं हिन्दी (कलेंडर) पंचांग के हिसाब से हिन्दी नववर्ष चैत्र महीने से माना जाता है। वहीं हमारे पहाड़ (उत्तराखंड) में चैत्र माह के पहले दिन अर्थात संक्रांत को 'फूलदेई या फूल संक्रांत' पर्व के रूप में मनाया जाता है।
phooldei-festival-of-uttarakhand-phooldeyi


इस दिन गाँव-घरों में बच्चे प्रात काल जल्दी उठने के बाद नहा-धोकर एक थाली और कटोरे में कुछ चाँवल, गुड़, मिश्री और इन दिनों होने वाले फूल(भिटोर, आड़ू, खुमानी, सरसों, प्योंली और बुरांस इतियादी के फूल) को रखकर अपने घर की देली (दहलीज/दरवाजे का चौखट) से शुरुवात कर के मोहल्ले के सभी घरों में जा कर देली की पुजा करते हैं अर्थात चाँवल और फूल चड़ाते हैं।

हर घर का एक सदस्य उनका इंतजार कर रहा होता है, वो सदस्य बच्चों की थाली में जो जो चीजें होती हैं उसी के समान उनकी थाली में चाँवल, गुड़, मिश्री, और पैसे अपने घर से भी देते हैं।

वो बच्चे अपनी पहाड़ी भाषा में कुछ पंक्तियाँ भी गुन गुनाते हैं:-
phooldeyi-फूलदेई या फूल संक्रांत"फूल देई छ्म्मा देई,
भाई जी को बैणा जी को।
लाख बरस की उम्र देई,
जतुके देई उतुकै सही।
देई द्वार भर भकार,
सास ब्वारी एक लकार।
फूल देई छ्म्मा देई,
यो देई हीं बारंबार नमस्कार।
फूल देई छ्म्मा देई,
जतुके देई उतुकै सही।"

बच्चे फिर सारा सामान इकट्ठा कर के अपने अपने घरों में ले जाते हैं और शाम को फिर उन चीजों का कोई पकवान बनाते हैं, जैसे चाँवल को पीस कर उसमें गुड़ या मिश्री मिला कर उसकी 'साई' (चाँवल का हलवा) बनाते हैं, फिर आस पड़ोस में भी बांटते हैं।

इस तरह से मनाया जाता है, ये फूलदेई का पर्व हमारे पूरे पहाड़ में। मैंने अपने गाँव में बड़े होते हुये जो देखा सुना वो आपके सामने प्रस्तुत किया। होता तो यही है पर हो सकता है कि इस रिवाज को मनाने का ढंग अलग अलग जगह पर अलग अलग हो।

अब धीरे धीरे इन परम्पराओं का प्रचलन कम होता जा रहा है। आधुनिकता की इस दौड़ में ये चीजें धीरे धीरे पीछे छूट रही हैं, आजकल के बच्चों का रुझान भी कम होता जा रहा है इन चीजों से।

इसके जिम्मेदार भी कहीं न कहीं हम ही हैं क्यूंकी अब बच्चों को वो पहले का जैसा ना तो माहौल मिलता है ना इन परम्पराओं के बारे में ज्ञान। इन सबकी वजह है अपने पहाड़ से होता हुआ पलायन।

लेकिन मेरा मानना तो यही है कि हमें इन परम्पराओं को जीवित रखने का प्रयास तो करना ही चाहिये, इनके बारे में अपने बच्चों को जानकारी दे कर।

फुलदेई त्यार पर बनी एक कुमाऊँनी हिन्दी कविता



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Friday, March 14, 2014

ब्रज मण्डल देश देखो रसिया.... मेरे गाँव की एक और होली !

दोस्तों भगवान कृष्ण के ब्रज मण्डल को समर्पित एक खड़ी होली गीत, जिसमें बृज के बारे में थोड़ा बहुत उल्लेख किया गया है।

हमारे गाँव में गाये जाने वाली होली गीत में से ये भी एक है। जितनी मुझे याद है आप लोगों के समक्ष रखने की कोशिस कर रहा हूँ। भूल चूक गलती माफ करना।

'ब्रज मण्डल देश देखो रसिया'

ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
हे ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
तेरे ब्रज में गाय बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में गाय बहुत हैं।
तेरे ब्रज में गाय बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में गाय बहुत हैं।
छोटे छोटे गाय बड़े बछिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
हाँ छोटे छोटे गाय बड़े बछिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
हे ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
तेरे ब्रज में मोर बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में मोर बहुत हैं।
तेरे ब्रज में मोर बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में मोर बहुत हैं।
नाचे मोर देखे रसिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
हाँ नाचे मोर देखे रसिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
होली भे होली भे.....होली भे।
ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
हे ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
तेरे ब्रज में धान बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में धान बहुत हैं।
तेरे ब्रज में धान बहुत हैं।
हे तेरे ब्रज में धान बहुत हैं।
कुटे नारी फटे रसिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
हाँ कुटे नारी फटे रसिया, ब्रज मण्डल देश देखो रसिया।
ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
हे ब्रज मण्डल देश देखो रसिया ।।2।।
होली भे...होली भे.....होली भे।
होली भे....होली भे.....होली भे।    |! समाप्त !|

धन्यवाद ! अपने सुझाव जरूर दें कमेंट कर के।

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Tuesday, March 11, 2014

मोस्ट या महट

दोस्तों आज इस मोस्ट (बांस या निगाल की बनी हुई एक प्रकार की चटाई) के बारे में कुछ बात करते हैं। जो शायद गाँव की उन पुरानी यादों को फिर से ताजा कर दें।

हमारे पहाड़ के गाँवों में पुराने समय में इन मोस्टों का उपयोग अनाज को धूप में सुखाने के लिये किया जाता था। आज से कुछ साल पहले तक गाँव के अधिकतर घरों में इनका इस्तेमाल किया जाता था।
कुछ जगह पे तो आज भी हैं ये पर केवल विलुप्त होती अवस्था में। क्यूंकि अब ना ही गाँवों में लोग उतनी खेती करते हैं और अगर कहीं पर होती भी है तो इन मोस्टों की जगह प्लास्टिक या कपड़ों के बनी हुई चटाईयों या तिरपाल (मोटे मजबूत कपड़े की दरी) ने ले ली है।
मोस्ट या महट
मोस्ट या महट

इन मोस्टों को कहीं-कहीं पे महट भी कहा जाता है, शायद और भी कुछ नाम हो सकते हैं इसके अलग अलग गाँवों में। ये चौकोर होते थे इन्हें फ़ोल्ड करने के लिये दो लोगों की जरूरत पढ़ती थी इसके दो सिरों पर से दो लोग इसे फ़ोल्ड करना एक साथ शुरू करते थे ताकी यह एक बेलनकार आकृति में फ़ोल्ड हो जाय। फ़ोल्ड करने के बाद इसे बांधने के लिये इसी पर बीच में एक घास की या कोई भी रस्सी होती थी जिस से इसे बांधा जाता था। फिर इसे अंदर भाड़ (छत से थोड़ा नीचे और कमरे के ऊपर बना हुआ एक लकड़ियों से बनी हुई रैक) में या कहीं पर घर के किसी कोने में रख दिया जाता था।

गाँव में घर में आग में ज्यादा खाना बनाने की वजह से धुवां होने से कालिख भी ज्यादा ही होती थी जिसे 'झाला" कहते हैं, उसकी वजह से घर में रखा हुआ अधिकतर समान का रंग भी काला ही हो जाता था। पर अब गाँवों में भी गैस-सिलेन्डर पहुँच ने लगे हैं जिस से आग में खाना बनाना भी कम हो रहा है धीरे धीरे।
उसी की वजह से चित्र में आपको इस मोस्ट का रंग भी काला सा लगेगा।

दोस्तों हमारे पूर्वजों ने ये चीजें बनाई थी प्रकृति की मदद से अपने हाथों से अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये। ऐसी बहुत सी चीजों का उन्होने निर्माण किया था उन लोगों ने केवल प्राकृतिक संपदा(पेड़, पौंधे, घास, पत्थर) की सहायता से। जो काफी मजबूत और टिकाऊ होते थे।
अब हम समय के साथ इतना आगे निकल गए हैं कि इनका उपयोग तो हम कर नहीं पा रहे हैं और हम शायद इनकी जरूरत भी महसूस नहीं होती, पर इतना जरूर हैं कि ये हमारे लिये हमारी धरोहरों के रूप में हैं ऐसा कहना गलत नहीं होगा।

ये मेरी बस एक छोटी सी कोशिस है इन अपनी धरोहरों अपने पूर्वजों की अमानत को अपनी यादों में हमेशा के लिये जीवित रखने की।

हम लोगों में से शायद किसी ने इन्हें नहीं भी देखा होगा, शायद किसी के गाँव में इंनका इस्तेमाल नहीं भी होता होगा, हो सकता है किसी अलग जगह पर इसे अलग नाम से जाना जाता होगा कुछ भी हो सकता है पर दोस्तो मेरी आप से एक विनती है कि आप अगर कुछ भी इस के बारे में जानते हैं तो अपने विचार जरूर व्यक्त करें।

इस बार अगस्त 2014 में हमारे एक फेस्बूक मित्र 'हरेन्द्र वर्मा जी' के द्वारा बागेस्वर के कपकोट मेले से ली गयी 'महट या मोस्ट' की एक ताजा तस्वीर प्राप्त हुयी। जानकर बहुत अच्छा लगा कि अब भी कुछ जगहों पर ये इस्तेमाल की जाती हैं।
मोस्ट या महट
महट या मोस्ट की एक ताजा तस्वीर


दोस्तों आप में से शायद कई लोगों को अजीब भी लगता होगा और कई लोगों को शायद अच्छा भी पर क्या करूँ खाली वक्त पर बैठ कर मुझे यही ऐसे ही कुछ ना कुछ लिखना अच्छा लगता है।

धन्यवाद ! पर अपनी राय और सुझाव जरूर दें !

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Monday, March 3, 2014

पाठी, दवात और लकड़ी की कलम

दोस्तों आज से लगभग 30 साल पहले [कहीं कहीं तो अभी भी] हमारे पहाड़ के गाँवों में प्राइमेरी स्तर तक पढ़ने-लिखने के लिये उतने खास साधन नहीं हुआ करते थे लोग दूर दूर तक मिलों पैदल चल कर स्कूल जाया करते थे।
paathi-dawat-lakdi ki kalam

पाठी में लिखता हुवा बच्चा 
पढ़ने लिखने के लिये प्राइमेरी स्तर तक के बच्चे कापी किताब की जगह तख्ते की बनी हुई एक आयतकर तख्ती का इस्तेमाल करते थे, जिसे काले रंग से पोत दिया जाता था।

काले रंग के लिये टॉर्च के सेल का प्रयोग या कोयले का प्रयोग करते थे। इस तख्ती को गाँव में "पाठी" कहते थे। इसमें दोनों ओर से एक धागा बंधा होता था जो कंधे में या पीठ में लटकाने के लिये बना होता था।

इस पाठी में लिखने के लिये जिस स्याही का प्रयोग होता था उसे खड़िया (सफ़ेद पत्थर या मिट्टी) से बनाया जाता था। इसे एक छोटे से प्लास्टिक या टीन के बर्तन जिन्हें दवात कहा जाता था, में पानी ढाल कर भीगा दिया जाता था।

इस दवात पर भी एक धागा बांध दिया जाता था हाथ में पकड़ने के लिये।
 
पाठी में लिखने के लिये एक लकड़ी की कलम बनाई जाती थी, जिसे दवात में डुबो डुबो कर लिखा जाता था। उसे दवात में ही रखा जाता था। ऐसे थे वो दिन वो वक़्त जो आज कितना बदल चुका है।

पहले तो हर घर में ये मिल जाते थे पर अब बहुत से पुराने घरों में ही आज भी रखे हुये हैं ये 'पाठी-दवात' एक याद के रूप में।

मेरे कई मित्रों द्वारा मुझे ये बताया गया है  कि आज भी कुछ जगहों पर प्राइमेरी में पढ़ने वाले छोटे बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिये इस्तेमाल हो रही हैं। हमने भी प्राइमेरी में पहली कक्षा तक इसी में पढ़ा था।

दोस्तों इस पोस्ट को लिखने का मेरा यही एक मात्र उद्देस्य है कि वो दिन और वो हमारी सांस्कृति विरासतें तो हमारे जेहन में अभी भी मौजूद हैं पर इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में वो थोड़ा थोड़ा कर के पीछे छूटते जा रहे हैं।
ये बहुत जरूरी है कि हमें इस समय के साथ कदम से कदम मिलना है, आगे बढ़ना है पर इसके लिये हम अपने वो सुनहरे पल भूल तो नहीं सकते ना। कल को आने वाली हमारी अगली पीड़ी को कम से कम ये तो पता होना चाहिये कि एक वो समय था जब ऐसा होता था। इसलिये मेरे मन में ये ख्याल आया क्यूँ ना थोड़ा सा वक़्त उन यादों को सँजोने में लगाऊँ।

मुझे पूरी आशा है कि आप लोगों को यह पोस्ट जरूर अच्छा लगेगा, ये जरूर आपके दिलों को छुवे का क्यूंकी कहीं न कहीं आपका भी इससे लगाव है।

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Wednesday, February 26, 2014

तरुड़ या तेड़ (एक पहाड़ी कंद मूल आहार)

'तरुड़ या तेड़' हमारे पहाड़ यानि उत्तरखंड में महाशिवरात्री के व्रत में इस आहार का उपयोग करते हैं। यह वैसे तो एक सब्जी है लेकिन आलू की तरह इसे भी फल की श्रेणी में रखा गया है।  यह फल शिवरात्रि के दिन शिवजी को भोग में लगाया जाता है। यह प्राय दिखने में थोड़ा सा शकरकंदी के समान होता है पर ये मीठा नहीं होता है।
तरुड़-tarud
इसके स्वाद को हमारे पहाड़ में 'फराव' कर के संबोधित किया जाता है। इसे आलू की ही समान श्रेणी में रखा जाता है। ये जमीन के अंदर होता है इसकी बेल होती है जिस पर इसके बीज लगते हैं।

गाँव में महाशिवरात्री के पहले दिन तरुड़ को  खोदा जाता है। कहा जाता है कि जब ये लगाया (रोपा) जाता है उसके तीसरे साल या उसके बाद इसे खोदते हैं। इसे खोदते समय यह भी कहा जाता है कि जब यह खोदते समय दिखने लगता है तो देख कर उत्साहित नहीं होना चाहिए वरना इस पर नजर लग जाती है और ये जमीन के अंदर धँसने लगता है और गायब हो जाता है।

गाँव में तो लगभग हर किसी को ये नसीब हो जाता है पर बाजार वाले इलाकों में लोग इसे बाजार से ही खरीदते हैं। फिर इसे उबालने के लिये रखा जाता है और साथ ही आलू भी इसके साथ उबालने के लिये रखे जाते हैं।
दिन में व्रत के दौरान इसे उबले आलू की तरह भी खाते हैं क्यूंकी इसे एक फल कहा जाता है, और शाम को एक टुकड़ा भगवान के भोग के लिये रख कर बाँकी की सब्जी बनाई जाती है...थोड़ी सूखी सब्जी और थोड़ी दही या छांस डाल के तरी वाली सब्जी ! 

महाशिवरात्री के दिन दोपहर के बाद घर का एक व्रत वाला सदस्य लाल मिट्टी से शिवजी और पार्वती जी की प्रतिमूर्ति बनाता है जिनकी शाम को मंदिर के पास रख कर पूजा पाठ करते हैं। गाँव में पूजा के समय शिवजी को बेल पत्री, पाती और तरुड़ का भोग लगाया जाता है।

 "फराव" क्या होता है ? (सहाभार: उमेश चन्द्र पंत)
कुमाऊँनी फराव शब्द हिंदी के फलाहार का अपभ्रंश है कुमाऊँ बोली की अपनी कोई लिपि नहीं है और अधिकतर शब्द दूसरी भाषाओं से बने हैं, इसी क्रम में फलाहार भी कालांतर में फ़राव कहव जाने लगा, पहाड़ी संस्कृति के अनुसार व्रत में दो प्रकार का आहार लिया जाता है फलाहार और निराहार अर्थात फ़राव और निराव, फ़राव में अन्न का उपयोग नहीं किया जाता सिर्फ़ फल खाया जाता है.
तरूड़ एक जंगली कंदमूल फल है जो वल्लरी लता पर फल और भूमिगत तने दोनों के रूप में लगता है, को महाशिवरात्रि के दिन उबाल कर खाया जाता है,
जबकि निराव में फल और अन्न दोनों का प्रयोग नहीं होता, या तो ख़ाली पेट या फिर दूध का सेवन किया जाता है।


वैसे पहाड़ी संस्कृति के अनुसार व्रत और भी कई प्रकार के होते हैं जैसे लूँणि अर्थात नमक वाला और अलूँणि अर्थात बिना नमक वाला।
कुमाऊँनी संस्कृति में एक व्रत ऐसा भी है जिसमें हल से उगा हुआ अनाज नहीं खाया जाता बल्कि कूदाल (कुटव या कुटल) से बोया हुआ अनाज खाया जाता है उसमें भी विशेष रूप से उगल (हिंदी नाम-कट्टू) के आटे से बना पकवान खाया जाता है। (सहाभार: उमेश चन्द्र पंत)


दोस्तों ये मैंने अपने गाँव में अपने घर में देखा है इसिलिये आप के सामने प्रस्तुत किया है....तरीका थोड़ा अलग हो सकता है हर जगह पर ज्यादा अलग नहीं। शायद ऐसा ही आपके गाँव, घर में भी होता होगा। कुछ तो आपकी यादें भी जुड़ी होंगी इस से।

इसी के साथ आप सभी को मेरी ओर से  महाशिवरात्री की ढेर सारी शुभकामनायें जय भोले नाथ। जय भोले भण्डारी।

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Friday, February 21, 2014

समूह ग भर्ती परीक्षा के लिए उम्र सीमा बढ़ा कर 42 की गयी।

उत्तराखंड सरकार ने बेरोजगारों को राहत देने के लिये राज्य की सरकारी नौकरी के लिये उम्र सीमा 2 बड़ाकर 42 वर्ष करने का अहम फैसला लिया है और साथ ही समूह -ग की भर्तियों के विस्तार के लिये उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के गठन को भी स्वीकृति दे दी है। इस से राज्य मेन लगभग 10 हजार खाली पड़े पदों पर तेजी से भर्ती प्रक्रिया सुरू हो सकेगी।

बुधवार को देर रात तक हुयी कैबिनेट की बैठक में ये अहम फैसला लिया गया। जो राज्य के उम्र दराज बेरोजगारों के लिये एक राहत है। कैबिनेट में समूह 'ग' के रिक्त पदों पर सीधी भर्ती को उत्तराखंड अधीनस्थ चयन आयोग के गठन और इसके लिये विधेयक के मसौदे को मंजूरी मिली।   

Wednesday, February 19, 2014

पहाड़ों में भीषण बर्फबारी

पिछले महीने हुई बर्फबारी से थोड़ी सी राहत हुई थी कि फिर से पिछले 2-3 दिनों में पहाड़ के पर्वतीय इलाकों में दोबारा हिमपात हो गया है। 

Tuesday, February 18, 2014

बुरांस का फूल (कफ़ुवा)

uttarakhand burans flowerबुरांस का फूल अपनी सुंदरता के साथ साथ बहुत ही गुणकारी औषधी के लिये भी प्रसिद्ध है। यह उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में देखने को मिलता है।

प्राय ये फाल्गुन-चैत यानि कि फरवरी-मार्च में खिलना प्रारम्भ होता है। लेकिन अब ये ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समय से पहले ही खिलता हुआ दिखने लगता है।

 इसका पेड़ उत्तराखंड के राज्य बृक्ष  की श्रेणी में रखा गया है। बसंत के आगमन से ही इसके खिलने पर यहाँ की हंसी वादियां और भी मनोहारी लगने लगती हैं। एक हर जगह अलग ही तरह का सुंदर मन को लुभाने वाला वातावरण बन जाता है।
बुरांस का फूल
 "कफ़ुवा खिल्ण बैगे ऊंचा-नीचा 'धुर डाना' का डान्यू मा"।
बुरांस का यह फूल बहुत सुंदर होता है। इस फूल का उपयोग कई प्रकार के कोस्मैटीक चीजों में भी किया जाता है।
बुरांस के फूल का ज़्यादातर उपयोग इसके जूस बनाने में किया जाता है जो बहुत ही स्वादिस्ट और उपयोगी होता है।

बुरांस का जूस गर्मियों में काफी राहत प्रदान करता है। लोग बुरांस के इन फूलों को इकट्ठा कर के जूस बनवाते हैं। 

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Tuesday, January 14, 2014

मकर संक्रांति अर्थात उत्तराखंड का घुघुती त्यार या पुषूडिया !

मकर संक्रांति अर्थात उत्तराखंड के घुघुती त्यार या पुषूडिया को कुमाऊँ में भी हर जगह अपने अलग अलग रीति रिवाजों के साथ मनाया जाता है। कहीं ये पौष माह के अंतिम दिन को मनाया जाता है और कहीं ये मकर संक्रांति वाले दिन यानि की माघ महीने के पहले दिन मनाया जाता है।

पुषूडिया पूजनपहले दिन सुबह देवताओं के रूप में पाँच पत्थरों को स्नान आदि कराया जाता है, फिर टीका चन्दन लगा के उनकी पूजा आरती की जाती है। फिर उनके सामने घुघूत, पूरी, बाड़ आदि का भोग लगाया जाता है, और एक स्थान पे कौवे के हिस्से का रख कर कौवे को पुकारा जाता है...काले कौवा काले काले,....! इसे  "पुषूडिया पूजन" के नाम से जाना जाता है। बाद में प्रसाद उठा कर और उन पांचों पत्थरों को एवं उन्हें चढ़ाये गए भोग को धरती माता में गाड़ दिया जाता है। साथ ही एक पत्ते में गाय के हिस्से का भी रखा जाता है जो गाय को खिलाया जाता है।
घुघुती त्यार
फिर दिन में धूप में बैठ कर घर के कुछ सदस्यों द्वारा घुघूते बनाये जाते हैं, सब लोग अपने हिसाब से इन घुगूत को बनाते हैं ! इनका आकार हिन्दी के चार अंक के जैसा होता है, साथ ही इनमें अलग अलग आकार भी बनाये जाते हैं, जैसे डमरू, तलवार, ढाल, आदि !

जिस घर में बच्चे ज्यादा होते हैं, उनके अनुसार ये ज्यादा बनते हैं, क्यूंकी बच्चों को इनकी लम्बी लम्बी माला बना कर गले में डाल ने का एक शौक होता है। और कुछ लोग अपने पड़ोसियों और रिसतेदारों के हिसाब से भी इन्हें बनाते हैं, क्यूंकी ये फिर उनमें छोटी छोटी माला बना कर बांटे भी जाते हैं। वहीं पर धूप में ये सूखते भी रहते हैं, ये भी लोग आपस में एक दूसरे में व्यंग कहते रहते हैं, कि इनकी देख रेख करते रहना कहीं ये उड़ ना जायें! क्यूंकि इन्हें घुघूते के नाम से जाना जाता है, और हमारे पहाड़ में घुघुत एक पक्षी का नाम भी है जो बहुत ही सुंदर होती है! इस पक्षी की बोली बहुत ही वेदना पूर्ण होती है। कुछ देर धूप में सुखाने के बाद और छोटी छोटी माला में पिरोने के बाद इन्हें, शाम के समय तेल में तला जाता है। दिन के भोजन में इस दिन अधिकतर लोग मास की खिचड़ी बनाते हैं वो भी तांबे के तौले में ! जिसे माघ के महीने की खिचड़ी कहते हैं।

फिर अगले दिन प्रात काल बच्चे सुबह सुबह उठ कर गले में घुघुतों की माला पहनकर कौवे को बुलाते हैं, पूरा माहोल कौवे को बुलाने के बोलों से गुंजायमान हो जाता है.....!
घुघुती माला

लोग कौवे को बुलाने के लिए अलग अलग व्यंग भी कहते रहते हैं। जैसे:
काले कौवा काले काले। 
घुघुती माला खाले खाले !
ले कौवा बाड़, मीके दे सुनू क घड़। 
ले कौवा लगड़, मैं कै दी जा सुनु सगड़. 
बड तू ली जा, घड़ मैं कै दी जा. 
पूरी तू लिजा, छुरी मैं कै दी जा.
काले कौवा आ ले, घुघूती माला खा ले !

बागेश्वर उत्तरायणी मेला और घुघुती त्यार को ले कर ये कथा भी प्रचलित है। 

बागेश्वर‬ ‪उत्तराखंड‬ 14 जनवरी से शुरू होने वाले बागेश्वर के मशहूर उत्तरायणी मेला सांस्कृतिक के साथ-साथ ऐतिहासिक धरोहर के रूप में जाना जाता है. प्राचीन समयानुसार उत्तरायणी मेले को लेकर एक खास कथा भी प्रचलित है. दरअसल, चन्द्रवंशी राजा कल्याण सिंह की कोई संतान नहीं थी. उन्हें बताया गया कि बागनाथ के दरबार में मन्‍नत मांगने से उन्हें अवश्य संतान प्राप्त होगी. ऐसा करने से उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हो गई और बेटे का नाम निर्भय चन्द्र रखा गया. पुत्र प्राप्ति से बहुत प्रसन्न रानी ने बच्चे को बहुमूल्य मोती की माला पहनाई. माला पहनकर बेटा बेहद प्रसन्न रहता था. एक बार जब बालक जिद करने लगा तो रानी ने उसे डराने के लिए उसकी माला कौवे को देने की धमकी दे डाली. बच्चा एक और जिद करने लगा कि कौआ को बुलाओ. रानी ने बच्चे को मनाने के लिए कौआ को बुलाना शुरू कर दिया.

बच्चा तरह-तरह के पकवान और मिठाइयां खाता था, उसका अवशेष कौओं को भी मिल जाता था. इसलिए कौवे बालक के इर्द-गिर्द घूमते रहते थे. फिर बेटे की कौओं से दोस्ती हो गई. वहीं घुघुती नामक राजा का मंत्री राजा के नि:संतान होने के कारण राजा के बाद राज्य का स्वामित्व पाने का स्वप्न देखा करता था, लेकिन निर्भय चन्द्र के कारण उसकी इच्छा फलीभूत न हो सकी. परिणामस्वरूप वह निर्भय चन्द्र की हत्या का षड्यंत्र रचने लगा और एक बार बालक को चुपचाप से घने जंगल में ले गया.

कौओं ने जब आंगन में बच्चे को नहीं देखा तो आकाश में उड़कर इधर-उधर उसे ढूंढ़ने लगे. अचानक उनकी नजर मंत्री पर पड़ी, जो बालक की हत्या की तैयारी कर रहा था. कौओं ने कांव-कांव का कोलाहल कर बालक के गले की माला अपनी चोंच में उठाकर राजमहल के प्रांगण में डाल दी. बच्चे की टूटी माला देखकर सब आशंकित हो गए तो मंत्री को बुलाया गया, लेकिन मंत्री कहीं नहीं मिला. राजा को षड्यंत्र का आभास हो गया और उन्होंने कौओं के पीछे-पीछे सैनिक भेजे. वहां जाकर उन्होंने देखा कि हजारों कौओं ने मंत्री घुघुती को चोंच मार-मार कर बुरी तरह घायल कर दिया था और बच्चा कौओं के साथ खेलने में मगन था.

निर्भय चंद्र और मंत्री घुघुती को लेकर राजा के सैनिक लौट आए. सारे कौवे भी आकर राजदरबार की मीनार पर बैठ गए. मंत्री घुघुती को मौत की सजा सुनाई गई और उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर कौओं को खिला दिए गए. लेकिन जब इससे कौवों का पेट नहीं भरा तो निर्भय चंद्र की प्राण रक्षा के उपहारस्वरूप विभिन्‍न प्रकार के पकवान बनाकर उन्हें खिलाए गए. इस घटना से प्रतिवर्ष घुघुती माला बनाकर कौओं को खिलाने की परम्परा शुरू हुई. यह संयोग ही था कि उस दिन मकर संक्रांति थी, इसीलिए उत्तरायणी मेले का मकर संक्रांति के दिन शुरू होने का खास महत्त्व है.

मान्‍यता के अनुसार, संक्रांति की सुबह जल्दी उठकर बच्चों को तिलक लगाकर, उनके गले में घुघुती की माला पहनाकर 'काले कौआ काले' कहने के लिए छत-आंगन या घर के दरवाजे पर खड़ा कर दिया जाता है. यह त्योहार बच्चों का ही त्योहार माना जाता है. बच्चे उस दिन बहुत खुश रहते हैं. अपनी माला में गछे, गेहूं के आटे में गुड़ मिलाकर घी या तेल में पके खजूरों को घुघुती का प्रतीक मानकर चिल्ला-चिल्ला कर गाते हैं- "काले कौआ काले, घुघुती माला खाले."


बागेश्वर उत्तरायणी कौतिक 2015 की विडियो

उत्तरायणी कौतिक की कुछ शानदार झलकियाँ

उत्तरायणी कौतिक 2016 की विडियो

उत्तरायणी कौतिक 2016 की कुछ शानदार झलकियाँ

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